‘मैं कितना कुछ हूँ, और कितना कुछ हो सकता हूँ’ : शिखर गोयल की कविताएँ

‘हर्फ़-ब-हर्फ़ तुम्हे देरतलक / हाथों से सहलाता हूँ / अपनी भाषा में / अक्सर मैं तुम्हें / अपने बहुत क़रीब पाता हूँ.’

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