'भूख ऐसे लगी हुई है जैसे गड्ढे में पेड़' : लीलाधर जगूड़ी का काव्यसंसार

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'भूख ऐसे लगी हुई है जैसे गड्ढे में पेड़' : लीलाधर जगूड़ी का काव्यसंसार

'भूख ऐसे लगी हुई है जैसे गड्ढे में पेड़' : लीलाधर जगूड़ी का काव्यसंसार

हमारे समय के प्रतनिधि हिंदी कवि लीलाधर जगूड़ी की काव्य यात्रा पर कविता पनिया का आलेख।  मैंने कुछ वर्ष पहले एक पत्रिका में ये पंक्तियां पढ़ी थीं -

"लेखक या कवि कैमरा नहीं वह एक संवेदनशील आंख है जिसके पास विचार धारा से पहले आंसुओं की धारा है " - लीलाधर जगूड़ी
मेरे लिए इतना काफी था। कवि को और पढ़ने की इच्छा जागी। कवि की कविता की धारा में अपने हाथ डूबोना शुरू किया और एक से बढ़कर एक मोती मिलने लगे।

कवि का सामान्य परिचय

लीलाधर जगूड़ी का जन्म १ जुलाई १९४४ को उत्तराखंड के टिहरी नामक जिले के धंगण गांव में हुआ। कुछ वर्षों बाद गांव में प्राकृतिक विपदा आई। बाढ़ में घर खेत आदि सब बह गए और जीविका के लिए शहर आना पड़ा। अपने प्रिय गांव को याद करते हुए वे अपनी एक कविता में कहते हैं
"जितने भी जंगल इस पृथ्वी पर हैं उनकी छाया से गुजरता हुआ मैं देखना चाहता हूं अपने को धंगण गांव जाता हुआ"

पांच साल की उम्र में इनकी मां का देहांत हो गया। ग्यारह साल की उम्र में ये घर छोड़ कर चले गए। ये चले गए राजस्थान के किसी गांव में, जहाँ एक संस्कृत विद्यालय था, और मुफ्त में शिक्षा दी जाती थी। इन्होने वहां प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की, और विषम परिस्थितियों में हिंदी में एमए तक पढ़ाई पूरी की। इन्होंने गढ़वाल रेजीमेंट में नौकरी की। लेकिन कुछ समय बाद इन्होंने वहां स्वयं को सेना के अनुकूल नहीं पाया, और नौकरी से यह कहते हुए इस्तीफा दे दिया कि वे साहित्य के द्वारा देश की सेवा करेंगे। और उन्होंने यही किया, जिसके लिए इन्हें पद्यश्री, साहित्य अकादमी, रघुवीर सहाय सम्मान से नवाज़ा गया है, और अभी हाल ही में इन्हें व्यास सम्मान देने की भी घोषणा की गई है। जीवन के ७५वें साल में प्रवेश कर चुके कवि ने विलक्षण साहित्यिक यात्रा की है। इनके कई काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं - शंखमुखी शिखरों पर , नाटक अब भी जारी है , इस यात्रा में, रात अब भी मौजूद है, बची हुई पृथ्वी, घबराए हुए शब्द, भय भी शक्ति देता है, अनुभव के आकाश में चांद, महाकाव्य के बिना, ईश्वर की अध्यक्षता में,खबर का मुंह विज्ञापन से ढका है आदि। इन्होंने १९६६ से १९८० तक उत्तराखंड के राजकीय विद्यालयों में शिक्षण कार्य भी किया। ये छात्रों के बीच बहुत ही मिलनसार और सर्वप्रिय अध्यापक के रूप में जाने जाते रहे हैं। इन्होने कई शिक्षक आंदोलनों में भाग लिया और कई बार जेल गए।

काव्य संग्रह और कविताएं

इनका पहला काव्य संग्रह ‘शंखमुखी शिखरों पर’ १९६४ में प्रकाशित हुआ था, जिसका उद्गम वह उत्तरकाशी को मानते हैं। इस संकलन में कुल सैंतीस कविताएं हैं, और सभी रचनाएं हिमालय की पर्वत श्रृंखला और प्राकृतिक वैभव को अंकित करती हुई पाठक के मन मस्तिष्क में मंत्र की तरह गूंजती हैं। प्रकृति के करीब रहते हुए उनकी कविताओं में प्रकृति के कई रंग देखने को मिलते हैं। वे लिखते हैं -
"मेरी आकाशगंगा में कभी बाढ़ नहीं आई मेरे पास तट ही नहीं है जिसे मैं भंग करने की सोचूं एक सांवला प्यार है मेरे पास सेबार जैसा जिसे पाने के लिए बहुत बार भेजे हैं धरती ने बादलों के उपहार"
इनका अगला काव्य संग्रह 'नाटक जारी है' साल १९७० में प्रकाशित हुआ। इस काव्य संग्रह में एक रचना है ‘नाटक जारी है’ जो ४३ पृष्ठों की है। लगभग ९०० पंक्तियां हैं और ३७ बंध हैं जो १९६७ से १९७० की कालावधि के बीच लिखी गई है। विलक्षण लम्बी कविता है यह। इसी काव्य संग्रह से 'आषाढ़' शीर्षक की एक कविता देखें -
"यह आषाढ़ जो तुमने मां के साथ रोपा था हमारे खेतों में घुटनों तक उठ गया है अगले इतवार फूल फूलेंगे कार्तिक पकेगा हमारा हंसिया झुकने से पहले हर पौधा तुम्हारी तरह झुका हुआ होगा उसी तरह जिस तरह झुककर तुमने आषाढ़ रोपा था"

इसके बाद तीन साल के अंतराल के बाद कवि का अगला काव्य संग्रह १९७३ में 'इस यात्रा में' प्रकाशित हुआ । जिसमें लगभग ३४ कविताएं हैं। इस काव्य संग्रह में उन्होंने अपने जीवन के अनुभवों को सहयात्री मानकर संकलन की यात्रा तय की है। इसी संकलन की एक रचना 'अंधेरे में बसंत।' कवि के भीतर के वेदना की अभिव्यक्ति है इस कविता में। कुछ पंक्तियाँ उद्धृत हैं -
"मिट्टी को फोड़कर निकलने का दर्द तमाम शाखाओं पर फूटना चाहता है नंगेपन पर झर चुकने के बाद एक अपराधी हल मुझसे कहता है कि हमने नहीं उगाया यह इस साल का फैसला हुआ जंगल तुम्हारे लिए मेरे लिए कुछ भी नहीं उगा कुछ भी नहीं"
आज के समय में जैसे जैसे इंसान प्रगति करता जा रहा है, उसकी आवश्यकताओं ने एक बहुमुखी भूख का रूप ले लिया है। देखिए कवि ने यह कैसे व्यक्त किया है -
"भूख ऐसे लगी हुई है जैसे गड्ढे में पेड़ पेड़ में पत्तियां पत्तियों में रंग भूख ऐसे धंस कर लगी हुई है जैसे ज़मीन के नीचे जड़ें ऐसे फैली हुई है जैसे आकाश में हवा ऐसे चुभी हुई है जैसे रिकार्ड पर सुई।"

रात को प्राचीनकाल से ही तमस अज्ञान, अवनति, या आसुरी का प्रतीक माना गया है। आलोक इसके विपरीत दृष्टिकोण का वर्णन करता है। लीलाधर जगूड़ी जी का १९७५ में काव्य संग्रह आया जिसमें उन्होंने देश में आपातकाल और अराजकता के वातावरण अवाम की चुप्पी को अपने कवि हृदय से व्यक्त किया है। राजनीति किस तरह सिर्फ सत्ता प्राप्ति का माध्यम बन गई है । अवसरवादिता, मौकापरस्ती और दलबदल अब सामान्य बात है। यह उनका वर्तमान राजनीति पर व्यंग है -
"किसी ने कहा है इसकी जुबान नहीं है जब इसे कहना कुछ और करना कुछ होता है तो इसी तरह जुबान बदल देता है मतलब कि इधर भी चरता है उधर भी चरता है मित्र इन दिनों सबने अपनी असली जीभ का इस्तेमाल बंद कर दिया है।"
१९७६ में "घबराए हुए शब्द" काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ, जिसमें ३७ रचनाएं हैं। इस संकलन की लगभग सभी रचनाएं यथार्थवादी हैं। इस संकलन की संपादकीय टिप्पणी में भी लिखा गया है कि "यथार्थ मनुष्य से भी प्राचीन है, और कवि उसे हर बार अपने समय और स्थान की चेतना में सही दूरी रख कर अनावृत करता है।” शोषित वर्ग के समक्ष सामंती वर्ग के तुच्छ अहम् पर उनकी एक कविता की पंक्तियां देखें -
"उन्हें भी मैं जानता हूं जो बूट पहनते हैं पर एक बार भी मरे हुए जानवर को याद नहीं करते जबकि बन्दूक वे एक बार भी नहीं भूलते पाते"

इसी सिलसिले में लीलाधर जगूड़ी का एक और काव्य संग्रह आया, १९७७ में। इस काव्य संग्रह में आशाओं और उम्मीद से भरी हुई कविताएं हैं, जो उन सभी के लिए प्रकाश-किरण की तरह प्रस्फुटित होती दिखाई देती हैं, जो हारे हुए हैं या निराशा के गर्त में डूबे हुए हैं। यहां पर पृथ्वी अर्थात जीवन की अस्मिता अपना अस्तित्व बचाने से है। उम्मीद की एक रचना देखिए -
"मैं तुम्हारे पास आऊंगा जैसे बादल पहाड़ की चींटी के पास आता है और लिपट जाता है जिसे वही देख पाते हैं जिनकी गरदन उठी हुई हो मैं आऊंगा आऊंगा तो उस तरह जैसे कि हारे हुए थके हुए में दम आता है"
इसी संग्रह की एक और कविता है, जिसमें कवि पुरातन को सर्वथा त्याज्य नहीं मानते। न ही नवीन को सर्वदा स्वीकार करते हैं। बहुत ही बेहतरीन प्रतीकों के माध्यम से कवि की कुशल अभिव्यक्ति है, जहां वे संतुलन चाहते हैं -
"जड़ें वहीं हों उसी तने पर वे ही टहनियां हों ज्यादा अच्छे लगते हैं तब नए पत्ते वरना नए पौधों में तो वो होते ही हैं"

एक दिन लोग अपने आडंबरों के मुखोंटों से बाहर आते हैं। ऐसी मनोदशा पर कवि का बेहतरीन व्यंग है। एक कविता में वे कहते हैं -
"इस पत्र के भीतर कुछ न रखिए न अपने विचार न अपनी यादें इस पत्र के भीतर कुछ न रखिए न अपने संबंधों की छाप न दुख न शिकायतें न अगली मुलाकात का वादा न पारिवारिक प्रलाप वरना ये पत्र पकड़ा जा सकता है इस पत्र के भीतर कुछ न रखिए"
इनका अगला काव्य संग्रह "अनुभव के आकाश में चाँद", जिसके लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया। इस काव्य संग्रह में ७४ कविताएं हैं, जो उनके पूर्व अनुभवों को विस्तृत फलक प्रदान करती हैं। इस संकलन की कविताओं में कथ्य के अतिरिक्त शिल्प का वैविध्य है। इनकी एक कविता है, जिसमें कवि अपनी विवशताओं को व्यस्तता में बदलना चाहते हैं, वे लिखते हैं -
"मेरे तोते मेरे हाथों से दूर मेरे घोड़े मेरे मन से दूर चले गए हैं ऐसे में मुझे एक तितली की प्रतीक्षा है जिसकी चंचलता थोड़ी देर के लिए ही सही स्थिर कर दे मुझे मेरी तल्लीनता से"

"ईश्वर की अध्यक्षता में" उनका दसवां काव्य संग्रह है जिसकी भूमिका में वे लिखते हैं -
"मेरी दृष्टि में अच्छी कविता वह है जो कवि के विचारों को नहीं, उसके समय और जीवन को लांघ जाए। कवि का जीवन कविता का जीवन हो जाए।"
इस काव्य संग्रह में कवि ने ईश्वर की सत्ता को नकारा है एक कविता में वे वाग्देवी सरस्वती से रुष्टता का भाव दर्शा रहे हैं -
"मां बता दो तो खैर है तुम सशस्त्र लोगों की सरस्वती हो या निशस्त्र लोगों की तुम ताबड़तोड़ तड़ातड़, भड़ाम-भड़ाम कैसे हो गई हो? यह तो तुम्हारा संगीत नहीं था इस धांय-धांय के बीच शब्द फूटने की प्रतीक्षा करें या शब्द फटने का इंतजार"

लीलाधर जगूड़ी की नई कविताएं हमें बहुत चौंकाती हैं। एक कविता है, जिसमें उन्होंने बहुत बड़ी छलांग लगाई है। साहित्यिक, राजनैतिक, और सांस्कृतिक छलांग। वह बहुत ही जिद्दी होकर कह रहे हैं -
"यदि आंख से न आ रहे हो शब्द कानों से आ रहे हो अर्थ का कोई रंग मुंह का कोई स्वाद कर्म की कोई कठिनाई ला रहे हो रंग की ध्वनि और ध्वनि के कोई रंग को अलग-अलग बतला रहे हो तब अनुभूति के कागज़ के लिए स्याही कम पड़ जाती है नये कर्मों के लिए शब्दों की उगाही करते हुए पृथ्वी छोटी पड़ जाती है मुझे थोड़ा बड़ा होना है पृथ्वी के साथ अगला पृष्ठ आकाश जोड़कर।"
सागर की तरह गहरी और अथाह कवि के काव्य संसार की धारा में बहते हुए हम जान पाते हैं कि वह किस तरह अपने अनुभव और भाषा के बीच कविता को जिंदा रखते हुए, अपने भोगे हुए जीवन-पद्धति को, अनुभव की उस पूंजी को, बड़ी सरलता और सहजता से कह देते हैं। पाठक यह सब पढ़ कर अवाक रह जाता है। यही उनका काव्य दर्शन है। (अंजुमन, बेंगलुरु द्वारा आयोजित कविता विमर्श के कार्यक्रम ‘रोमहास’ में पढ़ा गया पाठ।)
कविता पनिया हिंदी की कवयित्री हैं, और बेंगलुरु के क्राइस्ट कॉलेज में शिक्षिका हैं।
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