सुधीर रंजन सिंह की मोक्षधरा : कवि का मोक्ष कविता है

“एलियट ने कहा था कि अच्छी कविता समझ में आने से पहले ही अपना संवाद स्थापित करने में सक्षम होती है। सुधीर रंजन सिंह की कविताओं में अक्सर यही बात दिखाई पड़ती है,” सौरभ राय लिखते हैं।

नीरज घेवन की मसान : कभी-कभी ज़िंदगी अचानक से धप्पा भी दे देती है

“मसान कहती है कि जीवन में कुछ भी हो, चाहे कितना भी बड़ा या बुरा, वो जीवन से बड़ा नहीं हो सकता,” नीरज पांडेय लिखते हैं।

केदारनाथ सिंह की कविता ‘हॉकर’: वर्ग की प्रेमिका कौन है?

“प्रेम अराजनैतिक भी हो सकता है क्या? यहाँ तक कि स्त्री-पुरुष संबंध राजनैतिक है, फिर किसी समाज व्यवस्था से प्रेम, एक बेहतर कल का सपना, एक बेहतर व्यवस्था की चाह, भुखमरी-बेरोजगारी से छुटकारा कैसे अराजनैतिक होगा?” आशु लिखते हैं।

चार्ल्स बुकोव्स्की की ‘ऑन राइटिंग’ : क्या लेखन के लिए चरस और शराब ज़रूरी है?

“बुकोव्स्की को भी ख़ुद से वही सारी शिकायतें हैं जो मुझे उनसे हैं। यहाँ आकर हमारे बीच का मनमुटाव थोड़ा कम होता है,” नीरज पांडेय लिखते हैं।