सीमांतीय संवेदना और संघर्ष

बेंगलुरु की हिंदी कविता पर सौरभ राय का आलेख।

यह सर्वमान्य है कि बड़े शहरों का निर्माण देश के दूसरे क्षेत्रों से आये लोग करते हैं। चाहे वे दिहाड़ी मज़दूर हों, जो शहर के मकानों और वाणिज्यिक केन्द्रों को ईट-ईट जोड़कर गढ़ते हैं; या इनमें रहने और काम करने वाले सफेदपोश कर्मचारी, जो नगरपालिकाओं को सुनियोजित रूप से टैक्स भरते हैं, जिससे शहर के निर्माणक्रम को गति मिलती है। कुल मिलाकर शहर कई विस्थापितों का महासमूह होता है। उपर से शहर की भागदौड़ वाली जीवनशैली। इन सबके कारण नगरीय जीवन एकाकी और अ-लगावपूर्ण (alienating) होता है।

ऐतेहासिक रूप से इस अ-लगाव से मुक्ति दिलाने का काम कला करती आई है। किन्हीं कारणों से नगरों में अक्सर ऐसा परिवेश तैयार हो जाता है, जो कला को आगे धकेलने में मदद करती है। कविता की बात करें, तो भक्तिकाल का बनारस, मुग़लकालीन लखनऊ, और स्वाधीनता काल का इलाहबाद इसके बड़े उदहारण हैं, जब शहर में राजनितिक या आर्थिक गतिविधियों के बढ़ने से नगर का विकास हुआ, और साथ-साथ कविता भी आगे बढ़ी। इन शहरों में एक साथ कई बड़े कवि अपने मतभेदों को साथ लिए दिखलाई पड़े, और इन्होंने कविता का मूल परिदृश्य बदल दिया। हालाँकि पिछले कुछ दशकों में टेलीविज़न और इन्टरनेट के विकास से कविता हाशिये पर आई है, और छायावाद या भक्तिवाद जैसे आन्दोलनों की गुंजाइश अब नहीं के बराबर रह गई है, लेकिन अपने सीमित दायरे में नगर में कविता के विकास के आधुनिक उदहारण भी हमारे सामने मौजूद हैं। स्वधीनोत्तर भारत की अंग्रेजी कविता के विकासक्रम में बॉम्बे स्कूल ऑफ़ पोएट्स या कलकत्ता का हंगरीयलिस्ट आन्दोलन इसके जीते-जागते सबूत हैं।

बदलते हुए शहर

कविता से पहले शहरों की पड़ताल करें। उदारीकरण के बाद भारत में शहरों की जनसँख्या और शहरों की संख्या, दोनों में खासी वृद्धि हुई है। सुनील खिलनानी (भारतनामा, 2000) के मुताबिक नब्बे के दशक में आई बेशी आमदनी के बदौलत भारत में एक लाख से ज़्यादा आबादी वाले दो सौ से ज़्यादा शहर उभरकर आये। ये बेशी आमदनी अस्सी के दशक से ही भारतीय अर्थव्यवस्था में प्रवेश कर चुकी थी। उत्तर में यह ‘हरित क्रांति’ के ज़रिये बढ़ी खेती की पैदावार का नतीजा था। पश्चिमी राज्यों में यह ‘श्वेत क्रांति’ से हुई डेरी फ़ार्मिंग का परिणाम था, और दक्षिण भारत में यह बेशी आमदनी खाड़ी में काम कर रहे लोगों से आई।

उदारीकरण के बाद जहाँ नए शहरों की बाढ़ आ गई, वहीं पहले के बड़े शहरों में भी अलग अलग ढंग से बदलाव आये। इस दौरान तेज़ी से बढ़ते हुए शहरों में बेंगलुरु अग्रणी रहा है। स्वधीनोत्तर भारत में शहर का लम्बे अरसे तक कायम रहा माध्यमवर्गीय चरित्र, यहाँ की जलवायु और हरियाली, वैज्ञानिक अनुसंधान केन्द्रों का प्राचुर्य, और प्रौद्योगिकीय आधार की व्यापकता, सबने मिलकर शहर को एक बढ़ी जनसँख्या के लिए आकर्षक बनाया। खिलनानी के शब्दों में कहें तो, “इस [नए मध्य और उच्च] वर्ग की समृद्धि ज़मीन के मालिकाने, सरकारी नौकरियों अथवा उद्योग जैसे पारंपरिक श्रोतों की देन नहीं है, बल्कि उसने अपने व्यावसायिक और तकनिकी कौशल से पैसा कमाया है। […] 1990 के दशक से पहले अंतर्राष्ट्रीय निजी पूंजी की भारत की बंद अर्थव्यवस्था में बहुत छोटी भूमिका थी, लेकिन इस दशक में बेंगलूर इस पूंजी तक पहुँचने का सिंहद्वार बन गया।”

विभाजन से लेकर अबतक शहर जातिगत और धर्मगत हिंसा के भी केंद्र रहे हैं। उदारीकरण के बाद तेज़ी से बढ़ रहे शहरों को जहाँ खिलनानी ने जाति-आधारित राजनीति का अखाड़ा बताया, वहीं हिन्दू राष्ट्रवाद के नए समर्थकों की पौध, और उससे विकसित हिंसा की संस्कृति को इन्होंने यहीं बढ़ते हुए देखा। इस दृष्टि से वे बेंगलुरु को लेकर ये खासे निश्चिन्त नज़र आये, लेकिन बेंगलुरु में इन्हें नागरिकताबोध का आभाव खटका। मुंबई से बेंगलुरु की तुलना करते हुए खिलनानी लिखते हैं, “बम्बई और बंगलूर भारतीय आधुनिकता की परस्पर विपरीत संभावनाओं के अलग-अलग अवतार हैं। ये दोनों ही इस बात के प्रतीक हैं कि राष्ट्रवादी कल्पनाशीलता की संभावनाएं चुक गई हैं। उन्होंने भारत सम्बन्धी जिस समझ को जन्म दिया है वह नेहरु की समझ से अलग हैं। बम्बई में शिव सेना के एक समर्थक के लिए अपने आपको महाराष्ट्रीय अथवा हिन्दू कहना ज़्यादा फायदेमंद हो सकता है। भारतीयता उसके लिए मात्र उपयोगितावादी महत्व की चीज़ रह गई है। उसे भारतीय पहचान से कम फायदा होता है। इसी तरह बंगलूर के एक युवा एमबीए अथवा सॉफ्टवेर विशेषज्ञ के लिए अंतर्राष्ट्रीय रोज़गार बाज़ार में भारत केवल एक स्टेशन की तरह है।”

‘भारतनामा’ लिखे जाने के बाद के दो दशकों में बेंगलुरु की जनसँख्या चालीस लाख से सवा करोड़ की हो गई है। आज बेंगलुरु भारत की तीसरी सबसे बड़ी आबादी वाला शहर है। हालाँकि अपने सीमित दायरों में यह शहर हमेशा से ही अपने कल्चर को लेकर सुनिश्चित रहा है, लेकिन कल्चर कोई स्थाई चीज़ नहीं होती, और पिछले दो दशकों में आये शहर में बदलाव इसके बड़े संचालक रहे हैं। जहाँ शहर के नए इलाकों में जलवायु और हरियाली के प्रति कोई मोह नहीं दिखाई पड़ता, वहीं गौरी लंकेश की हत्या इसका प्रमाण है कि बेंगलुरु हिन्दू राष्ट्रवाद और हिंसा की संस्कृति से अछूता नहीं है। ऐसे में शहर का कल्चरल परिवेश भी बदला है।

बेंगलुरु की कविता

खिलनानी ने बेंगलुरु को भारत का सबसे ‘अँगरेज़ीदाँ’ शहर कहा है। शहर का यह चरित्र आज भी बरकरार है। चेन्नास्वामी क्रिकेट मैदान के सामने एक रेस्तरां है कोशिज़ (Koshy’s), जहाँ साठ और सत्तर के दशक में हर रविवार की सुबह कॉफ़ी और नाश्ते पर कवितापाठ चलता था। इन आयोजनों में सभी उम्र और भाषाओं के कविताप्रेमी, खासकर तमिल, कन्नड़, और अंग्रेज़ी के कविताप्रेमी शामिल होते। घरों में भी आत्मीय और निजी गोष्ठियां होती थीं, जिनके किस्से शहर के पुराने वाशिंदे सुनाते हैं। इस धारा का अपना नैसर्गिक विकास भी हुआ है। आज की तारीख़ में हर वीकेंड को कविता के पांच-छह बड़े आयोजन बेंगलुरु में होते ही हैं। इन्हीं में एक वार्षिक आयोजन है हंड्रेड थाउजेंड पोएट्स फॉर चेंज (hundred thousand poets for change), जिसे एक अंतर्राष्ट्रीय मुहीम के अंतर्गत आयोजित किया जाता है। इसमें दुनियाभर के कवि एक निर्धारित दिन को, स्वेच्छा से अपने-अपने शहरों में फासीवाद, हिंसा की राजनीती, और सामाजिक विद्वेष के खिलाफ कविताएँ पढ़ते हैं। कुछ साल पहले मैंने इस गोष्ठी में भाग लिया था, जिसमें शिरीन लातुरकर नाम की चौदह साल की एक लड़की ने अपनी एक कविता सुनाई थी। अ रेनबो ऑफ़ कलर्स (रंगों का इन्द्रधनुष) नाम की इस कविता में शिरीन ने समलैंगिकों के अधिकार का प्रश्न उठाया था। कविता की आखरी पंक्तियाँ थीं –

In traffic jams there are street hawkers
They sell umbrellas with a rainbow of colours
But if their significance was known,
Would there still be buyers?

अनुवाद –

ट्रैफ़िक जामों में खोमचेवाले
इन्द्रधनुषी छाते बेचते हैं
अगर इसका मतलब समझते
क्या मिलते उन्हें खरीददार ?

चौदह साल की उम्र में इस तरह की अनुभव-चैतन्यता मुझे विलक्षण लगी। ऐसे कई कविता-गोष्ठियों के दौरान शहर में लिखी जा रही कविता से मैं भविष्य की अभिव्यक्ति को लेकर आश्वासित हुआ हूँ। बेंगलुरु में कन्नड़ा और अंग्रेजी भाषाओं के अलग-अलग पीढ़ियों के कवि आज भी एकसाथ सक्रीय हैं। वरिष्ठ कवियों की बात करें, तो कन्नड़ा में चंद्रशेखर कम्बार, ममता सागर, प्रतिभा नंदकुमार, और जयंत कैकिनी से लेकर अंग्रेज़ी में मणि राव, अमृता डोंगरे, नंदिता बोस, और मैत्रेयि भट्टाचार्जी चौधरी जैसे कवि अपने-अपने ढंग से काव्यकर्म में लगे हुए हैं।

हिंदी कविता में रूचि

हालाँकि शहर की सांस्कृतिक और नगरीय चेतना का यथोचित लाभ हमें भी मिला है, लेकिन हिंदी कविता में बढ़ती रूचि बेंगलुरु में नई घटना है। इसका कारण, मुख्यतः, शहर में हिंदी भाषियों की बढ़ती हुई आबादी है, जिससे यहाँ हिंदी के प्रति उत्साह भी बढ़ता दिख रहा है। यह आकस्मिक नहीं है कि शहर के हिंदी कवि सामान्यतः युवा हैं। इनमें कोई आईटी की नौकरी कर रहा है तो कोई छात्र है। ये ऐसे कवि हैं जो जीवन-यापन और दैनिक-गतिविधियों से इतर स्वान्तः सुखाय अपनी कविता साध रहे हैं। उदहारण के लिए शहर के एक विज्ञान संस्था में पीएचडी कर रहे एक कवि हैं अभिनव यादव। अट्ठाईस साल की उम्र में इनकी कविता असाधारण नगरीय-बोध लिए हुए दिखाई देती है। वसुधा-97 में इनकी एक कविता प्रकाशित हुई थी ‘मेरा कमरा।’ कविता संभवतः, एक स्त्री को संबोधित करते हुए लिखी गई है जिसे कवि अपने निवास-स्थान में बुलाना चाहता है, लेकिन उसकी ‘गलियां बहुत तंग हैं / रास्ते भी सीधे नहीं / पता भी छोटा नहीं’। आगे लिखते हैं –

जगह कम है, बस एक बिस्तर ही अट पाता है
उस पर लेटो तो ये कमरा ताबूत नज़र आता है
बल्ब जल गया तो दिन हुआ
न जला तो दिन नहीं

सच कहूँ, ये कमरा पिंजरा लगता है और ये शहर चिड़ियाघर
दूर दूर से इंसान पकड़ कर लाए जाते हैं यहाँ
अपनी अपनी कलाबाजियाँ दिखने को
पता नहीं कभी वापस जा पाएंगे या नहीं

अभिनव की कविता न केवल विस्थापन की व्यथा, बल्कि उसके चरित्र की भी नब्ज़ पकड़ती है। पिछले कुछ दशकों में शहर में आये लोगों की प्रवृति में बुनियादी फ़र्क आया है, जिसे समझने की ज़रुरत है। पहले का प्रवासी शहर में रहते हुए भी अपने गाँव का नागरिक होता था। वह शहर की आर्थिक गतिविधियों में शामिल तो होता था, लेकिन अपने कमाए हुए पैसों का वापस गाँव जाकर में निवेश करता था। खेती-बाड़ी खरीदता था, घर बनवाता था। वह शहर को अपना घर नहीं, बल्कि आर्थिक क्रिया-कलाप का एक केंद्र मानता था। यह संयुक्त परिवार का दौर था, जब घर का आदमी कलकत्ता पहुँचता था तो पूरे परिवार को लगता था कि वे कलकत्ता पहुँच गए हैं। शहर जाकर नौकरी करते बिदेसिया के इसी मर्म को पकड़कर भिखारी ठाकुर ने विरह-गीत लिखा था –

गोड़वा में जूता नइखे सिरवा प छातवा ए सजनी
कइसे चलीहें रहतवा ए सजनी
पियवा गइले कलकतवा ए सजनी।

आज यह स्थिति उलट गई है। अब जो जिस शहर में काम करने जाता है, वहीं बस जाना चाहता है। हालाँकि मज़दूर भी झुग्गियों में अपना ठिकाना तलाश लेते हैं, लेकिन शहरों में बस जाने की यह प्रवृति मध्यवर्ग में अधिक है। नगरीय चेतना बढ़ी है। शहर में घर होना मध्यवर्गीय आदमी के लिए निवेश और सामाजिक प्रतिष्ठा का भी मामला बन गया है। मजदूर अभी भी कमाकर गाँव ले जाने के बारे में सोचता है, लेकिन मध्यवर्ग का आदमी अब ये बिलकुल नहीं करता। उसका ध्यान शहर में पूंजी बनाने पर ही रहता है। इसी मध्यवर्ग का सरोकार कविता या कविताकर्म से होता है, जिसका गाँव या नेटिव से रिश्ता अब बिलकुल टूट गया है। यह एक बड़ा परिवर्तन है, जिसे अभिनव यादव की पंक्ति में शहर का चिड़ियाघर बन जाना, जहाँ से लोग ‘पता नहीं कभी वापस जा पाएंगे या नहीं’ इसी मर्म को ध्वनित करती है।

ज़मीन का आभाव

अभिनव किंचित नए कवि हैं, और अबतक अपनी कविता की ज़मीन तलाश रहे हैं। उनका मूल्यांकन फिलहाल ग़ैरज़रूरी है, लेकिन अपनी कविता की नगरीय चेतना और भविष्य की संभावनाओं को देखते हुए मुझे इनकी कविता आकर्षित करती है। बेंगलुरु के सन्दर्भ में, हालांकि, नगरीय चेतना का प्रश्न इतना सरल नहीं है। सुनील खिलनानी के शब्दों में, बेंगलुरु का ‘अंतर्राष्ट्रीय रोज़गार बाज़ार में केवल एक स्टेशन’ होना यहाँ की कविता को जड़ें जमाने से रोकतीं हैं। यहाँ की कविता में जन से जुड़ाव की कमी सर्वाधिक खटकती है। इसका मुख्य कारण, हमारी समझ से, भाषा की बोधगम्यता का आभाव है। एक अहिन्दी भाषी क्षेत्र में रहने के कारण यहाँ का हिंदी भाषी स्थानीय दुकानदार से, या ऑटो वाले से बात करने में हिचकता है। न ही उसके पास इतना समय है, न इतना माद्दा कि कन्नड़ा सीख ले। इसलिए तमाम कोशिशों के बावजूद अबतक यहाँ के कवि बेंगलुरु की आत्मा में सोखकर कविता नहीं लिख पाए हैं। जिस तरह से ज्ञानेन्द्रपति की कविता में बनारस, या राजेश जोशी की कविता में भोपाल जीवंत हो उठता है; वैसे प्रयास बेंगलुरु की हिंदी कविता में देखने को अबतक नहीं मिले हैं। अभिनव की कविता बेंगलुरु के बजाय मुंबई में लिखी गई होती तो भी कविता में ख़ास बदलाव नहीं करने पड़ते। बाकी शहरों में लिखी जा रही युवा कविताओं की तुलना में बेंगलुरु में लोकेल का आभाव है। यह कविता की ज़मीन से जुड़ा मामला है।

लोकेल के आभाव में कविता जिस भौतिक सेटिंग को टटोलती है, उसकी बात करते हैं। बेंगलुरु से सांस्कृतिक या भाषिक जुड़ाव की कमी यहाँ के कवियों को अपने ढंग से कविता के नए विन्यास ढूँढने पर मजबूर करती है। इसका एक समाधान स्मृतियों के जगत में विचरण करना हैं। अपने घर-परिवार या बचपन को याद करते हुए नास्टैल्जिया में कविता लिखना। वे छोटी-बड़ी चीज़ें जो खो गई हैं, भाषा और कविता में उनकी हिफाज़त करना। उनके लिए जगह बनाये रखना। ऐसी ही एक कविता है ‘कंचे’, जिसे बेंगलुरु के कवि अतुल जैन ने लिखा है। ये राजस्थान से हैं, और यहाँ आईटी की नौकरी करते हैं। ‘कंचे’ कविता लगभग शोक में लिखी गई है। एक ज़माना था जब कंचों से खेला करते थे, जो अब बीत गया। लेकिन कविता में शोक केवल कंचों के प्रति नहीं है, बल्कि ख़ुदके खोये हुए भोलेपन के प्रति भी है –

अब जेबें भी
उनके भार से
फटती नहीं होंगी
संगमरमरी फर्शों पर
कंचे ठहरते नहीं होंगे
तारकोल की सड़कों पर
गुप्पियाँ खोदना
मुश्किल होता होगा
नस्लें जानती न होंगी
इनसे गुजरती रोशनी को
मुमकिन है खज़ाने की कीमत
कुछ नहीं होगी।

नगरीय चेतना और नास्टैल्जिया से अलग भी कविता की ज़मीन तलाशी जा सकती है। बेंगलुरु के कई कवि इस तलाश को अपने-अपने ढंग से साध रहे हैं, या रुसी फ़ॉर्मलिज़्म के सहारे कहें तो डिवाइस कर रहे हैं। इस कारण यहाँ की कविता में कुछ रोचक प्रयोग भी देखने को मिल रहे हैं। ये प्रयोग कभी-कभी सार्थक सिद्ध होते हैं। साल 2015 में आटा गलाटा (जो नगर में भारतीय भाषाओं की किताबों के विक्रेता और साहित्यिक आयोजनों का स्थल हैं, और जो बेंगलुरु कविता महोत्सव का भी आयोजन करते हैं) ने प्रकाशन में प्रवेश किया। इनकी पहली किताब का नाम था कर्णकविता, जिसमें यहाँ के 30 हिंदी कवियों की कविताएँ संकलित थीं। संकलन के पहले कवि थे अंकुर पाण्डेय, जिनकी कविता ‘शून्यालाप’ अपनी प्रयोगधर्मिता के कारण पाठकों में सराही गई। कविता की शुरुवाती पंक्तियाँ देखें –

संडे रात चार बजे
मैं छज्जे से रोड को
और पाइथन के कोड को
देख कर सोच रहा कैसे डिबग करूँ?
तारकोल उढ़ेल कर, रूबी को रेल पर
लैपटॉप गोदी और हिंदुस्तान मोदी पर
डाल कर मैं हो गया हूँ पात-पात,
गात माहिं बात करामात,
इंस्टाग्राम व्हाट्सैप
यूपी में गैंगरेप
अर्थशास्त्र-राजनीति-तकनीक-संगीत-कला
शब्दों का सिलसिला
पीला-पीला, पिलपिला
कहीं कहीं लाल भी
रंगों में घिसट-घिसट
बीत गए मिनट-मिनट
घंटे-दिन, दिन-महीने,
साल भी
बालों की खाल भी

अपने छोटे-बड़े जीवनानुभवों से कविता लिखना पिछले कुछ दशकों की कविता की मुख्य प्रवृति रही है। बेंगलुरु की कविता इसका अपवाद नहीं है। पाइथन, रूबी ऑन रेल्स, ये कंप्यूटर प्रोग्रामिंग की भाषाएँ हैं। अंकुर पाण्डेय की कविता जिस जीवन और स्पेस का बखान करती है, वो भी बेंगलुरु के एक आईटी कर्मर्चारी का जिया हुआ यथार्थ है, जिसमें ‘लैपटॉप गोदी और हिंदुस्तान मोदी पर डाल कर’ कवि झुंझला रहा है। ये कवि की अनुभूति ही है, जो नगरीय जीवन के अ-लगाव को कंप्यूटर प्रोग्रामिंग की भाषा में अपनी अभिव्यक्ति दे रहा है।

इसी तरह शहर के एक और कवि हैं प्रतीक कपूर जिनकी कविता ‘सौ बटा तीन’ गणित की भाषा में लिखी गई है। उल्लेखनीय है कि यह एक प्रेम कविता है। कविता का एक अंश नीचे उधृत है –

तुम मेरी वो एक हसरत हो
जो बच जाती है
सौ को तीन से भाग करने के बाद

वो एक हसरत
जो अभी मिल जायेगी शायद
या फिर न जाने
दशमलव के कितने तीन बाद
छुपी बैठी होगी
किसी तीन का हाथ पकड़े।

जैसा कि हमने पहले लिखा, बेंगलुरु के कवि स्वान्तः सुखाय कविता साध रहे हैं। आर्थिक फायदे या प्रतिष्ठा की दृष्टि से इन्हें कविता से कुछ हासिल नहीं हो रहा (इसलिए भी, क्योंकि ये नौसिखिया हैं।) इसका एक बड़ा हासिल यह है कि बेंगलुरु की कविता में राजनीति घर नहीं कर पाई है। राजनितिक चिंतन नहीं, राजनीति। आपसी गुटबाज़ी, जोड़तोड़, तरफ़दारी – ये प्रवृतियाँ बेंगलुरु में अबतक मुझे देखने को नहीं मिलीं हैं। वरिष्ठ कवियों की उपस्थिति का आभाव जहाँ प्रशिक्षण की दृष्टि से अखरता है, वहीं इसका फायदा युवाओं को यह मिलता है कि हमें इस बात की छूट मिल जाती है कि हम गलतियाँ कर सकें, और अपनी गलतियों से सीख सकें। मुक्तिबोध युवा कवियों से एक अच्छी कविता लिखने के लिए सौ खराब कविताएँ लिखने की हिदायत देते थे। उन्हीं के शब्दों में “साहित्य के लिए साहित्य से निर्वासन आवश्यक है” (एक साहित्यिक की डायरी)। खराब कविताएँ लिखने का मौका और साहित्य से निर्वासन, ये दोनों सुविधाएं बेंगलुरु शहर अपने कवियों को देता है। वाहवाही अपनी जगह पर है, लेकिन शहर के कवि जब आपस मिलते हैं तो तर्कनिष्ठ होकर एक दूसरे की कविता को देखते-परखते हैं। यह छोटे समूहों में अधिक होता है। ऐसे में कोई छोटा या बड़ा नहीं रह जाता। कविता महत्वपूर्ण हो जाती है और कवि गौण। प्रशिक्षण या मेंटर का आभाव, कवियों के नए-नए ढंग से सीखने के लिए भी उत्साहित करता है। शहर का अकादमिक माहौल भी इस प्रवृति को बढ़ावा दे रहा है। मैंने तमाम भाषाओं के कई युवा कवियों को किताबें पढ़कर, या कोर्सेरा (coursera), यूट्यूब इत्यादि के माध्यम से कविता सीखते देखा है। शहर में हिंदी कविता की गोष्ठियों में भी वरिष्ठ कवियों की कविताएँ हमेशा पढ़ी जाती हैं। यहाँ हिंदी कविता केन्द्रित एक गोष्ठी का आयोजन होता है, रोमहास के नाम से, जिसमें कविताप्रेमी अपने प्रिय कवियों पर बात करते हैं और उनकी कविताएँ साझा करते हैं। इन मासिक गोष्ठियों में बुल्ले शाह, नज़ीर, और ग़ालिब से लेकर निराला और शमशेर जैसे कवियों पर विस्तार से चर्चा हुई है, जिसमें भाग लेने सभी भाषाओं के कविताप्रेमी इकट्ठे हुए हैं। बेंगलुरु कविता महोत्सव के अंतर्गत भी सुधीर रंजन सिंह, अरुण कमल, और अनामिका जैसे वरिष्ठ और महत्वपूर्ण कवियों ने यहाँ कार्यशालाएं आयोजित की हैं, जिसका लाभ शहर के युवाओं ने उठाया है।

भाषा और राजनीति

यहाँ की अधिकाँश गोष्ठियां भाषा को लेकर पक्षपात नहीं करतीं, और तमाम भाषाओं के कवि सहज मित्र भी बन जाते हैं। शहर के हिंदी, अंग्रेज़ी, और कन्नड़ा कवियों का आपसी मेलजोल मुझे बेहद आश्वासित करता है। पश्चिमी देशों के सपोर्ट ग्रुप्स की तरह इस महानगर में कविता उखड़े-पखड़े लोगों को जोड़ने का काम करती है। अंग्रेजी के कवियों की संगत अपने ढंग से हिंदी और कन्नड़ा कवियों आधुनिक बनाती है, काव्य-अभिव्यक्ति और चिंतन दोनों स्तरों पर; वहीं हिंदी और कन्नड़ा का सान्निध्य अंग्रेज़ी कवियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने में मदद करता है। मैंने शहर के कई अंग्रेजी कवियों को अपनी मातृभाषा में कविता लिखने की कोशिश करते देखा है, और ये एक सराहनीय ट्रेंड है।

शहर की एक वरिष्ठ कन्नड़ा कवयित्री हैं ममता सागर, जो ‘काव्य संजे’ नाम की एक गोष्ठी आयोजित करती हैं। इसमें भारतीय व देश-विदेश की तमाम भाषाओं की कविताएँ व उनके अनुवाद साझा किये जाते हैं। इसमें हिंदी के कवि भी खुलकर हिस्सा लेते हैं। ‘काव्य संजे’ का आयोजन अनिवार्यतः, सरकारी स्कूलों के प्रांगन, मेट्रो स्टेशन की टिकट खिड़की के पास, या शहर के किसी पार्क जैसे सामूहिक स्थान में होता है। ममता सागर के अनुसार ये कविता के बहाने पब्लिक स्पेस को क्लेम करने का भी मामला है। इन गोष्ठियों में कविता अपनी उपस्थिति मात्र से राजनितिक हस्तक्षेप करती दिखाई देती है। ऐसी ही एक सार्वजनिक कविता गोष्ठि ‘पोएट्री इन द पार्क’ के नाम से शहर के कबन पार्क में हर महीने होती है, जिसमें आधा समय आग़ा शाहिद अली, जयंत महापात्र जैसे किसी चयनित सीनियर कवि को पढ़ते हुए बिताया जाता है। बाकी समय उपस्थित लोग अपनी रचनाएँ पढ़ते हैं। ऐसे आयोजनों में बेंगलुरु की सांस्कृतिक, राजनितिक, और अकादमिक चेतना सम्वेषित होती दिखाई पड़ती है।

यहाँ इस बात की स्वीकृति आवश्यक है कि बेंगलुरु में हिंदी कविता से पहले हिंदी नाटक का विकास हुआ। साल 2004 में शहर में रंग शंकरा की स्थापना हुई, जो कन्नड़ा थिएटर परिदृश्य के लिए बहुत बड़ी घटना थी। अरुंधती नाग, गिरीश कर्नाड, महेश दत्तानी जैसे रंगकर्मी इससे शुरू से जुड़े रहे हैं। इनके द्वारा आयोजित कार्यशालाओं से अभिषेक मजुमदार, संदीप शिखर, अमित शर्मा, रमणीक सिंह जैसे रंगकर्मी उभरकर आये हैं जो आज राष्ट्रिय स्तर पर हिंदी नाटक का परिदृश्य बदल रहे हैं। बेंगलुरु में हिंदी नाटकों को सहज दर्शक मिल जाते हैं, जिसका प्रभाव कविता में बढ़ती रूचि पर भी दिखाई देता है। यह आकस्मिक नहीं है कि शहर के कई रंगकर्मी कविता से भी जुड़े हुए हैं।

दूसरी बात। चाहे वो रंग शंकरा में खेले जाने वाले नाटक हों, काव्य संजे की बहुभाषीय गोष्ठियां, या आटा गलाटा द्वारा कर्णकविता का प्रकाशन; कन्नड़ा समुदाय को सहिष्णुता विरासत में मिली है। ख़ुद कन्नड़ा के कुछ बड़े लेखक कन्नड़ा-भाषी नहीं हैं। ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कवियों और नाटककारों की ही बात करें, तो दत्तात्रेय रामचंद्र बेन्द्रे मराठी-भाषी थी, मास्ती वेंकटेश अयंगार तमिल-भाषी थे, और गिरीश कर्नाड कोंकणी हैं। यहाँ के महत्वपूर्ण साहित्यकार और समाजकर्मी डी॰वी॰ गुंडप्प भी तेलुगु भाषी थे। कन्नड़ा समाज में दखनी, मराठी, तेलुगु, व तमिल भाषी सहज घुले-मिले हुए हैं। तेलगु और कन्नड़ा की लिपि में समानता है, और इनकी सांस्कृतिक जड़ें भी एक हैं। लम्बे समय तक विजयनगर साम्राज्य की राजधानी हम्पी का सौंदर्य-बखान तेलगु और कन्नड़ा साहित्य का मानक रहा है। ऐसे में भाषिक विभिन्नताओं को दरकिनार कर आपसी समानताओं को देखना कन्नड़ा समुदाय की प्रवृत्ति शुरू से ही रही है।

बेंगलुरु की एक कवयित्री हैं जया श्रीनिवासन। ये पेशे से रंगकर्मी, चित्रकार, और कत्थक नृत्यांगना हैं। कला के दूसरी विधाओं से इस तरह का गहरा जुड़ाव इनकी कविता में साफ़ झलकता है। इनकी एक कविता है ‘बारहमासा’, जिसमें षड्ऋतु की प्राकृतिक विशेषताओं को जोड़ते हुए ये विरह के उन्माद की विलक्षण सर्जना करती हैं। कविता में जिस तरह से मुद्राएँ वर्णित हैं, इससे न केवल एक नृत्यांगना के संवेदनशील मन को हम देख पाते है, बल्कि बिम्बों का संयोजन और उनकी ऐंद्रिकता कवि के चित्रकार पक्ष को भी उजागर करती है। कविता की कुछ पंक्तियाँ उधृत हैं –

धूप चढ़ाती है
धरती की देह पर
कनक के वरक़
आसमान नाचता है
धूल के ढोल बजाता हुआ
हांफते हैं पहाड़ जंगल
थके भूरे बैल से
मटमैली नदी रातभर
खोजती है तारों में
चैती का धीमा राग।

बेंगलुरु की जो कविताएँ एक बड़े पाठक वर्ग के सामने आई है, उसमें सबसे चर्चित नाम, संभवतः, लवली गोस्वामी का है। कविता के अलावा इनका दर्शनशास्त्र और मिथकीय-चिंतन में भी हस्तक्षेप है। इनकी कविताएँ अक्सर प्रेम पर बारीक निरिक्षण की श्रंखला की तरह अभिव्यक्त होती हैं। चाहे इनकी कविताओं के बिम्ब हों या वाग्मिक स्थापनाएं, इन कविताओं में लॉजिक सैधांतिक रूप से मौजूद रहता है। ये कविताएँ अक्सर तत्वमीमांसा से सरोकार रखती हैं, जो दृष्टि शायद इन्हें दर्शनशास्त्र का शोधार्थी होने के कारण सहज मिलती है। लेकिन बात वहीं तक सीमित नहीं रह जाती। ये यथोचित ढंग से लॉजिक से आगे भी निकलने का सामर्थ्य दिखाती हैं, और तार्किकता को ट्रांसेंड करती हैं। ‘कविता में अर्थ’ नाम की एक छोटी कविता में यह स्पष्ट दिखाई देता है –

एक दिन मुझे एक अदम्य जिज्ञासु
तार्किक आदमी मिला

वह हर बीज को फोड़ कर देख रहा था
कि उसके अंदर क्या है

मैं उसे अंत तक समझा नहीं पाई
कि बीज के अंदर पेड़ होते हैं।

नई प्रवृत्तियाँ

पिछले कुछ वर्षों में बेंगलुरु की कविता में कुछ नए आग्रह दिखाई पड़ रहे हैं। एक नए ढंग की कविता के प्रति युवाओं का रुझान बढ़ा है, जिसे स्पोकेन वर्ड या स्लैम पोएट्री का नाम दिया जा रहा है। ये कवि बिना किसी तैयारी के मंच पर आते हैं, और खड़े-खड़े कविता गढ़ना शुरू कर देते हैं। ये रुझान हालाँकि अंग्रेजी कविता में अधिक देखने को मिल रहा है, लेकिन हिंदी कविता में रूचि लेते युवा इससे निरापद नहीं हैं। खूब लम्बी और शब्दाडंबरपूर्ण ये कविताएँ साठ के दशक की बीट मूवमेंट की याद दिलाता है, लेकिन गिन्सबर्ग समेत उस दौर के कवियों की परिपक्वता का आभाव इनमें साफ़ झलकता है। बड़ी समस्या यह है कि ये कवि मिलजुलकर काम करने से अधिक कम्पीट करने में यकीन रखते हैं। इन कवियों में आपसी स्पर्धा कराने के लिए शहर में आयोजकों की भी कमी नहीं। प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए कवि अपने पैसे डालते हैं, और प्रतियोगिता जीतने वाले को पुरस्कार मिलता है। कुल मिलाकर बीट मूवमेंट या अकविता के प्रतिवादी चिंतन से बिलकुल मुख़्तलिफ़, बेंगलुरु की स्पोकेन वर्ड या स्लैम पोएट्री अपने चरित्र से पूरी तरह पूंजीवादी है। इस ढंग की कविता का विकासक्रम अभी देखा जाना बाकी है, लेकिन फिलहाल ये एक विशिष्ट वर्ग की भड़ास और शेखी से अधिक कुछ प्रतीत नहीं हो रहा। अगर ये थोड़ी तैयारी के साथ कविता में उतरें तो बात बन सकती हैं।

बेंगलुरु अपने नए प्रारूप में स्टार्टअप कैपिटल भी है। ऐसे में योरकोट (yourquote) नाम का एक बेंगलुरु-केन्द्रित स्टार्टअप भी देश भर में युवाओं को कविता लिखने को प्रेरित कर रहा है, जिसकी चर्चा किया बिना बात पूरी नहीं की जा सकती। इनके मोबाइल एप का दस लाख से अधिक लोग इस्तेमाल करते हैं। इनकी काव्य गोष्ठियां बेंगलुरु समेत देशभर में आयोजित की जाती हैं, और हालाँकि इनमें कविताएँ बेहद साधारण पढ़ी जाती हैं, लेकिन इन कविताओं के विडियो यूट्यूब और इनके एप पर लाखों लोग देखते हैं। इनके एप पर अंग्रेज़ी से अधिक हिंदी कविताएँ देखी और पढ़ी जा रही हैं। कुल मिलकर योरकोट कविता को डिजिटल माध्यमों को जोड़ रहा है, और कविता को युवाओं के लिए आकर्षक और आकांक्षापूर्ण बना रहा है। सूचना प्रद्योगिकी के नए माध्यमों के दौर में योरकोट जैसा स्टार्टअप अपरिहार्य था, लेकिन क्या इससे कविता आगे बढ़ेगी या ये युवाओं की एक पूरी पीढ़ी को कविता के नाम पर आत्ममुग्ध बनाकर छोड़ देगा, ये अभी देखा जाना अभी बाकी है।

लेबनान के निबंधकार और सांख्यिकीविद नसीम तालेब के अनुसार ऐतेहासिक प्रगति में सीमांत, जिसे वो आउटलायर की संज्ञा देते हैं, अक्सर गहरे और महत्वपूर्ण बदलाव लाता है। जब ये बदलाव आ रहे होते हैं, तब अक्सर हम इन्हें देख या समझ नहीं पाते। संगीत के विकासक्रम में कर्णाटक के उत्तरी हिस्से में स्थित शहर धारवाड़ का उदहारण लें। एक लम्बे समय तक इस शहर में कर्णाटिक और हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का संगम हुआ। अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण यहाँ हैदराबाद की मौसीक़ी, पुणे के संगीत घरानों के ताल, और दक्षिण भारत की शहनाई और वीणा की गूँज लम्बे समय तक साथ सुनाई पड़ती आई। यह आकस्मिक नहीं था नहीं कि इस छोटे से शहर ने कुमार गन्धर्व, बसवराज राजगुरु, पुट्टराज गवई, मल्लिकार्जुन मन्सूर, गंगुबाई हंगल, भीमसेन जोशी, वेंकटेश कुमार जैसे कई संगीत के कलाकारों को जन्म दिया।

आधुनिक बेंगलुरु हिंदी कविता का सीमान्त क्षेत्र है। हिंदी में लिखने वाले कवि अक्सर अपने रूममेट से ही अंग्रेजी में बात कर रहे होते हैं, और किराने वाले से टूटी-फूटी भाषा में। लेकिन यही अभिव्यक्ति का आभाव उसे हिंदी कविता में रूचि लेने और लिखने की ओर भी अग्रसर करता है। ऐसे में क्या यहाँ की कविता आगे चलकर नए प्रारूप गढ़ेगी, यह देखा जाना है। कुल मिलाकर बेंगलुरु में हिंदी के कई कवि अपने-अपने ढंग से कविताएँ लिख रहे हैं, और ये मुख्यतः युवा और नौसिखिये हैं। बावजूद इसके, ये कवि मुझे आश्वस्त करते हैं। जीवनानुभवों से जन्मी और नगरीय विडम्बनाओं को दर्शाती ये कविताएँ, कन्नड़ा और अंग्रेज़ी का सान्निध्य पाकर अपने प्रारूप और चिंतन को आधुनिक बनाने में सफल रही हैं, लेकिन कविता की ज़मीन की तलाश एक लम्बी और सुस्थिर प्रक्रिया है, जो धैर्य और संघर्ष की माँग करता है। मेरे इस लेख का उद्येश्य बेंगलुरु की कविता का मूल्यांकन कतई नहीं है, क्योंकि ये बिलकुल प्रारंभिक स्तर पर लिख रहे हैं। लेकिन बेंगलुरु की हिंदी कविता का परिदृश्य मुझे उत्साहित नहीं करता, यह कहना भी गलत होगा।

पहल 117 से साभार।

 

(बायें से दाएँ) अभिनव यादव, जया श्रीनिवासन, अतुल जैन

बेंगलुरु निवासी सौरभ राय कवि, अनुवादक, व पत्रकार हैं। इन दिनों वे बेंगलुरु रिव्यु का संपादन कर रहे हैं।


बेंगलुरु रिव्यु में पढ़ें :

कवि का मोक्ष कविता है

चित्रों के लिखित उपयोग की महागाथा

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