चार्ल्स बुकोव्स्की की ‘ऑन राइटिंग’ : क्या लेखन के लिए चरस और शराब ज़रूरी है?

“बुकोव्स्की को भी ख़ुद से वही सारी शिकायतें हैं जो मुझे उनसे हैं। यहाँ आकर हमारे बीच का मनमुटाव थोड़ा कम होता है,” नीरज पांडेय लिखते हैं।

चार्ल्स बुकोव्स्की मुझे कितने पसंद हैं इस बात का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक वक़्त पर मैं सोचता था कि बूढ़ा होने पर बुकोव्स्की बनूँगा। पर हर रिश्ते की तरह मेरे और बुकोव्स्की के रिश्ते में भी कुछ उतार चढ़ाव आए। इसकी शुरुआत तब हुई जब मैंने उनकी कविता ‘So You Want to Become a Writer’ पढ़ी। अगर आपने वह कविता पढ़ी है तो आपको पता होगा कि यह कविता सिर्फ़ लिखने की बात करती है, बिना किसी और प्रलोभन के। मुझे इससे एतराज़ इस बात का था कि फिर एक नया लड़का जो मुझ जैसा है, जो सीखना चाहता है लेखन को, वो क्या करे? क्या यही सोच कर बैठा रहे कि जब ‘फ़ील’ आएगी या ‘मूड’ बनेगा तब लिखूँगा। शायद एक दो बार मूड में आकर कुछ लिख दिया जाए पर जब रोज़ लिखना होगा, काम की तरह, तब? इस बात को लेकर मेरी बुकोव्स्की से एक लम्बे वक़्त तक नाराज़गी रही है। मैं इस कविता में उन्हें हारता हुआ देखना चाहता था। कई और वजहों के साथ साथ मेरा शराब पीना पूरी तरह बंद कर देने की एक वजह यह भी थी कि मैं बिना किसी के इन्फ़्लूयन्स को बहाना बनाए लिखना चाहता था। देखना चाहता था कि इसके बिना क्या होता है? क्योंकि मेरे आसपास एक ऐसी भीड़ भी दिखी जो ख़ाली इस बात पर शराब पिए जा रही थी कि बुकोव्स्की भी पीते थे, और वो बहुत बढ़िया लेखक थे। आख़िर अच्छे लेखन का रास्ता शराब, चरस और दुःख-दर्द से होकर ही तो जाता है। मैं इस वजह से भी बुकोव्स्की से नाराज़ था। फिर सोचा क्यूँ ना उसे ज़रा और बेहतर तरीक़े से जाना जाए। आख़िर प्यार तो दादाजी से है ही मुझे।

पिछले महीने बुकोव्स्की की ‘On Writing’ पढ़ना शुरू किया। यह किताब उनके पत्राचार की किताब है। 1945 से लेकर 1993 तक के सारे पत्र हैं इसमें जो बुकोव्स्की ने अपने लेखक और दोस्तों को लिखे थे। इनको पढ़कर ऐसा लगता है जैसे बुकोव्स्की से उनके बग़ल में बैठ कर बातचीत हो रही हो। वहीं उनके टाइपराइटर के पास। यह किताब पढ़ते उनकी कविता ‘So You Want to Become a Writer’ की नींव समझ में आ ही गयी। पहली बात यह कि बुकोव्स्की कभी ‘Professional Writer’ नहीं बनना चाहते थे। मेरी और बुकोव्स्की की आधी लड़ाई तो यहीं ख़त्म हो जाती है, क्योंकि मेरा सफ़र भी उनसे अलग है। अपने पोस्ट ऑफ़िस के काम से बोर हो चुके बुकोव्स्की ने लिखने को अपना ज़रिया बनाया जहाँ वो ख़ुद को व्यक्त करने के लिए कहानी और कविताएँ लिखने लगे। अपने डिप्रेशन की वजह से लगातार पीते रहते और जब जो दिल में आता लिखते। एक जगह वो लिखते हैं कि शायद उन्हें लिखने से ज़्यादा टाइपराइटर की आवाज़ पसंद है। जब पन्ने पर एक एक शब्द मिल कर एक लाइन बनाते हैं वो बहुत ही सुंदर एहसास होता उन्हें।

Lafayette Young को लिखे एक पत्र में वो हेमिंवे के बारे में लिखते हैं “…But Popeye knew when to move. So did Hemingway, until he started talking about ‘discipline.’ ”। इसे और इसके बाद के कई सारे पत्रों को पढ़ने पर साफ़ साफ़ समझ आता है कि बुकोव्स्की को किसी भी तरह के लेखन से जुड़े नियमों ये दिक़्क़त थी। William Packard को लिखे एक लम्बे लेटर में वह लिखते हैं “NOW THEY TEACH POETRY. THEY TEACH HOW TO WRITE POETRY. Where did they get the idea that they ever knew anything about it? This is mystery to me. How did they get so wise so fast and so dumb so fast?” लिखना बुकोव्स्की के लिए सिगरेट पीने जैसा था। तलब लगी और हो गए शुरू। पर कुछ ही पन्नों बाद उन्होंने अपने पत्रों में ‘राइटर्स ब्लॉक’ से जूझने की भी बात की और लिखा है कि ‘…but writing takes discipline like everything else. The hours go by very fast, and even when I’m not writing, I’m jelling, and that’s why I don’t like people around bringing me beer and chatting.- I can understand why Hemingway needed his bull ring. It was quick action trip to rest his sights…’

आज बुकोव्स्की की पॉप्युलैरिटी का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि लोग चाहे बुकोव्स्की को पढ़े या ना पढ़ें उनके बारे में महफ़िलों में बात ज़रूर करते हैं। पर क्या बुकोव्स्की ने कभी ऐसे मशहूर होना चाहा था? उनके पत्रों को पढ़कर इसका जवाब ‘ना’ में ही आता है। एक जगह वो लिखते हैं ‘The process of writing is reward in itself’. बुकोव्स्की को इस बात की ख़ुशी है कि वो अपनी जवानी के दिनों में अपने काम के लिए नहीं जाने गए। और इसी वजह से वो लगातार काम कर पाए। जबकि बाक़ी के लेखक जिनको बहुत जल्दी प्रसिद्धि मिली, उन्होंने लिखने के अलावा बाक़ी की हर तरह की बात में अपना वक़्त ज़ाया किया। बुकोव्स्की के बारे में इतना क़रीब से पढ़ने पर पता चलता है कि उन्होंने ‘So you want to become a writer’ क्यूँ लिखी। उन्हें भी ख़ुद से वही सारी शिकायतें हैं जो मुझे उनसे हैं। यहाँ आकर हमारे बीच का मनमुटाव थोड़ा कम होता है।

बुकोव्स्की को अपने लेखनकाल में बहुत सारी रिजेक्शन का सामना करना पड़ा। एक पब्लिशर दोस्त को बुकोव्स्की लिखते हैं ‘मैं आजकल कहानियाँ नहीं लिख पा रहा हूँ, वो आ ही नहीं रहीं। और यह भी जानता हूँ कि कविताएँ लिखकर मैं रेंट तक नहीं दे पाउँगा।’ बुकोव्स्की ख़ुद को कभी भी महान लेखक नहीं मानते पर उन्होंने अपने वक़्त में कला और कविता के नाम पर हो रहे छिछोरेपन पर खुलकर कठोर शब्दों में लिखा। बुकोव्स्की का लेखन ईमानदार था।

एक लेखक के तौर पर बुकोव्स्की की बहुत सी बातें मुझे समझ में आती हैं और पर मैं सबके साथ सहमति नहीं रख सकता क्योंकि उनका वक़्त और तरीक़ा कुछ और था। एक और बात जो मैं कभी बुकोव्स्की से मिलता तो ज़रूर पूछता कि ‘कला और दुःख का क्या कनेक्शन है भाई? हिंदुस्तान का युवा दुःख तलाशने में मरा जा रहा है कि उससे इसके बिना कला नहीं हो पा रही। कलम उठाने से पहले आदमी यहाँ लम्बा कुर्ता और चरस का बंदोबस्त करने लगता है। बुकोव्स्की बाबा आप इसपर क्या बोलते हो?’ यह पूछने के लिए बुकोव्स्की से बेहतर आदमी नहीं हो सकता क्योंकि वो आदमी लगातार डिप्रेस्ड था, लगातार पिये जा रहा था और लगातार लिखे जा रहा था। बुकोव्स्की 6 नवम्बर 1988 को Carl Weissner को लिखे गए पत्र में इसपर साफ़ साफ़ लिखते हैं “I’d much rather prefer to write from a happy state of mind and do so when that rare and lucky bit arrives. I don’t believe in pain as a pusher of art. We can breathe without it. If it will let us.”

बुकोव्स्की की इस किताब से जो बात मैं समझ पाया वो बस इतनी सी है कि आपका रास्ता चाहे जो भी हो एक लेखक के तौर पर ईमानदार होना पहली शर्त है। हम समाज का आइना होने की बात करते हैं पर क्या हम ख़ुद का आइना बन पाते हैं? क्या हम चरस या शराब पीते हुए इतने ईमानदार हो सकते हैं कि हम यह कह पाएँ कि ‘ये तो मैं इसलिए कर रहा हूँ कि मुझे ये करने में मज़ा आता है। मेरे लेखन का इससे कोई लेना देना नहीं।’ यह काम बुकोव्स्की ने अपने जीवन में लगातार किया है। अगर हम (मेरे जैसे और भी लेखक) बुकोव्स्की को एक मानक मानते हैं या उनसे प्रभावित हैं तो हमें उनसे अपने प्रति ईमानदारी सीखनी होगी। लेखन के आसपास रचे सारे आडंबरों को स्वाहा करना होगा और बस लिखना होगा। चाहे फ़ील आए या ना आए। क्योंकि चाह हम सबको प्रफ़ेशनल लेखक बनाने की ही है।

और आख़िरी बात बुकोव्स्की के लिए लिखना कभी काम नहीं था। लिखना प्यार था उनके लिए। बुकोव्स्की शब्दों और उनसे बनते वाक्य के बारे में ऐसे बात करते हैं जैसे अपनी आँखों के सामने अपने बच्चे को बड़ा होते देख रहे हों। उनके सारे पत्र पढ़ कर इस बात का एहसास होता है कि शायद हम कभी अपने लेखन से उतना प्यार ना कर पाएँ जितना उन्होंने किया। क्योंकि हम बस लिखने के लिए ना तो लिखते हैं और ना ही पीने के लिए बस पीते हैं। हमें दोनों तरफ़ ईमानदार होने की ज़रूरत है।

Source: Facebook

मुंबई निवासी नीरज पांडेय स्वतंत्र लेखन करते हैं।

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