सत्य से आगे क्या : आज के समय में गांधी

Forgot password?

Delete Comment

Are you sure you want to delete this comment?

सत्य से आगे क्या : आज के समय में गांधी

सौरभ राय का आलेख।

‘हिन्द स्वराज’ में गांधी ने सबसे पहली बात अखबारों की भूमिका पर की है। 1909 में लिखे गए इस मैनिफेस्टो में एक कल्पित संपादक और पाठक के बीच की बातचीत है, जिसमें संपादक अपनी दूसरी पंक्ति में ही कहता है - “अखबार का एक काम तो है लोगों की भावनाएँ जानना और उन्हें ज़ाहिर करना; दूसरा काम है लोगों में अमुक ज़रूरी भावनाएं पैदा करना; और तीसरा काम है लोगों में दोष हों तो चाहे जितनी मुसीबतें आने पर भी बेधड़क होकर उन्हें दिखाना।” इन तीनों दायित्वों में हमें सत्याग्रह के अलग-अलग पहलू दिखाई पड़ते हैं। सत्य तक पहुँचने की निरंतर कोशिश करना, लोगों को सत्य के अनुसंधान की ओर अग्रसर करना, और तमाम बाधाओं के बावजूद उनसे सत्य का परिचय करवाना।

आज मीडिया संस्थानों की भरमार है जो सिर्फ अखबारों तक सीमित नहीं हैं। लेकिन कहने की ज़रुरत नहीं कि तमाम पैसों और संसाधनों के बावजूद मीडिया इनमें से किसी भी कर्तव्य का निर्वाह नहीं कर रही है। हम सत्य से दूर होते जा रहे हैं, या यूं कहें कि हम सत्य से आगे निकल आये हैं, जिसे पश्चिमी मीडिया ‘पोस्ट ट्रूथ’ (उत्तर सत्य) का नाम देती है, और जिसे ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में 2016 के सर्वाधिक प्रचलित शब्द के रूप में भी जोड़ा गया है। गांधी के अपने डिक्शन में ‘सत्य’ सबसे ज़रूरी शब्दों में रहा है। लेकिन जब सत्य का कोई एक रूप हमारे बीच उपलब्ध ही न हो तो क्या किया जाए? आज बंद कमरों में बैठकर ख़बरों का निर्माण किया जाता है। हमारे पास इतने आंकड़े और इतनी जानकारियाँ उपलब्ध हैं कि इन्हें तोड़-मरोड़कर किसी भी बात की सत्य के रूप में पुष्टि की जा सकती है। ख़बरों की ज़ाब्तगी किये बिना उनका प्रचार-प्रसार चलता है। जिसे जो देखना-जानना है वह उस तक आसानी से पहुँच रहा है, और इससे हमारे पूर्वाग्रह और दृढ होते जा रहे हैं। हमारे लोकतंत्र में बहस-मुबाहिसे की गुंजाईश ख़त्म हो रही है। आज सबके पास अपना-अपना सत्य है जिसके लिए लोग जान तक देने को आमादा है।

ऐसी स्थिति में, हमारी समझ से, पत्रकारिता की मूलभूत समझ हमें गांधी से मिल सकती है। दरअसल गांधी पत्रकारिता का उद्देश्य सेवा मानते थे। ‘सत्य के प्रयोग’ में वे अपने ख़ुदके अखबार के बारे में लिखते हैं, ‘इंडियन ओपिनियन के पहले महीने के कामकाज से ही मैं इस परिणाम पर पहुँच गया था कि समाचार पत्र सेवा भाव से ही चलने चाहिए। समाचार पत्र एक जबरदस्त शक्ति हैं, किन्तु जिस प्रकार निरंकुश पानी का प्रवाह गाँव के गाँव डुबो देता है और फसल को नष्ट कर देता है, उसी प्रकार कल का निरंकुश प्रवाह भी नाश की श्रृष्टि करता है।’ ‘हिंद स्वराज’ में भी उन्होंने इंग्लैंड के अखबारों को ‘अप्रमाणिक’ और ‘एक बात को दो शक्लें देने वाली संस्था’ कहा है। ‘इंडियन ओपिनियन’ के 4 सितम्बर के सम्पादकीय में उन्होंने अपने अखबार में विज्ञापन न लेने की घोषणा की। लिखा कि विज्ञापन उन लोगों का तंत्र है जिन्हें अमीर होने की हड़बड़ी है और जो अपने प्रतिद्वंदियों को जबरन हराना चाहते हैं। उन्होंने विज्ञापनों को आधुनिक सभ्यता की सबसे दुखद प्रवृति बताई। गांधी ने अपने जीवनकाल में चार अखबार निकाले, जिनमें से किसी के लिए उन्होंने कभी कोई विज्ञापन नहीं लिया।

गांधी एक ‘अजीबोगरीब शख्सियत’ थे। दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए ही उनपर किताबें छपनी शुरू हो गई थी। साल 1915 में ही कविगुरु रवीन्द्रनाथ उन्हें महात्मा की उपाधि दे चुके थे। दुनियाभर की प्रेस उनका पीछा करती थी और वे निडर और बेबाक होकर अपनी राह चलते। चमचमाते कैमरों के बीच इंग्लैंड की रानी से मिलने बकिंघम पैलेस में लाठी लेकर नंगे बदन घुस जाने वाले व्यक्ति के लिए बिना विज्ञापन लिए अखबार चलाना शायद संभव रहा होगा। लेकिन आज के अखबारों को हम जितने पैसे देकर खरीदते हैं, क्या उतने पैसों में उसके कागज़ का खर्च भी निकल सकता है? कुछ पत्र पत्रिकाएँ हैं, जो सदस्यता के दम पर चल रही हैं और प्रमाणिक और तथ्यपरक रिपोर्टिंग करती हैं, मसलन ‘इकनोमिक एंड पोलिटिकल वीकली’, ‘कैरावान’, ‘न्यू यॉर्क टाइम्स’ वगैरह। लेकिन क्या ये पत्रिकाएँ समाज के एक विशिष्ट वर्ग तक सीमित होकर नहीं रह गई हैं? क्या ये पत्रिकाएँ एक बड़ी आवाम तक पहुँच पा रही हैं? सिर्फ सदस्यता के सहारे चलने वाली साहित्यिक पत्रिकाओं का हश्र तो हम देख ही चुके हैं।

जाली खबरें और मिथ्या-प्रचार कोई नई घटना नहीं है। सत्ताएं इसका इस्तेमाल आवाम की सम्मति तय्यार करने के लिए करती आई हैं। पहले विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटिश मीडिया ने खुलकर जर्मनी के कृत्यों को बढ़ा-चढ़ाकर बताया, और हफ्ते भर में उनकी युद्ध-विरोधी जनता जंग के लिए आमादा हो गई थी। खुद गांधी मिथ्या-प्रचार के शिकार हुए थे। नवम्बर 1946 में वे नोआखाली में थे जब बिहार में दंगे फूट पड़े। अफवाह फैली, जिसकी अखबारों ने पुष्टि भी की, कि पचास हज़ार से अधिक मुसलामान मौत के घात उतार दिए गए हैं, जबकि वास्तव में मृतकों की संख्या दस हज़ार से कम थी। ख़बर की पुष्टि किये बिना हिंसा की आग फैलती चली गई। साल भर बाद, 27 नवम्बर 1947 को गांधी ने अपनी प्रार्थना सभा में पाकिस्तानी अखबार ‘डॉन’ का हवाला देकर काठियावाड़ में हो रही हिंसा के लिए सरदार पटेल और अपने भतीजे सामलदास गांधी की खुलकर निंदा की। इस वक़्त भी वे बढ़ा-चढ़ाकर प्रसारित ख़बरों से प्रभावित थे। पटेल ने गांधीजी से तीन दिन बाद हुई बातचीत में यहाँ तक कहा कि जो खबरें उन तक आती हैं, उनमें से काफी बातें बनी-बनाई होती हैं, और उन्हें ये खबरें प्रसारित नहीं करनी चाहिये।

अगर गांधी झूठी ख़बरों की चपेट में आ सकते हैं, तो हमारी-आपकी क्या बिसात! ऐसे में हमारे पास क्या रास्ता बचता है? इसका जवाब भी हमें गांधी से ही मिलता है। इतिहासकार सुधीर चन्द्र ने ‘गांधी एक असंभव सम्भावना’ (राजकमल प्रकाशन, 2016) में इस प्रसंग का उल्लेख करते हुए स्वीकारा है कि, ‘गांधी को इस मामले में अहतियात बरतना चाहिए था।’ लेकिन आगे एक गांधीवादी की विचारधारा साफ़ झलकती है - ‘सवाल इसके सही या गलत होने का नहीं है, इसके होने की स्वाभाविक आत्म-सजगता का है। एक बार अगर हमें अपनी ऐसी प्रतिक्रिया की स्वाभाविकता का भान हो जाए, तो देर-सबेर इसी तरह के दूसरे सन्दर्भों के उठने पर बहुत संभव है कि हमें जो भी प्रतिक्रिया हो, उसके प्रति हम आत्म सजग हो जाएँ। मसलन, संभव है कि पाकिस्तान में उन दिनों हो रही हिंसा की हिन्दुस्तानी अखबारों में छपी ख़बरों को पढ़ते-पढ़ते हम अपने आप से पूछ बैठें कि उन ख़बरों की कितनी तसदीक की गई थी। एक बार दिमाग में ऐसा खटका हो जाए तो यह परेशानी भी होगी कि कैसे ‘अपनी’ और ‘पराये’ की एक-सी करनी देखते वक़्त हमारी नजर बदल जाती है, और हमें उस फेर का भान नहीं होता।’

आत्म-सजगता और अपने पराये के बीच का भेदभाव मिटा देना, ये दोनों बातें गांधी खुदपर लागू करते थे। इस कारण से वे बार-बार ख़ुदको भी खंडित करते दिखाई देते हैं। सत्य गांधी के लिए कोई स्थाई वस्तु थी ही नहीं। ‘हिन्द स्वराज’ में उन्होंने रेल का विरोध किया है, ये कहते हुए कि रेल बीमारियाँ और अपराध फैलाने का काम करती हैं। वहीं लगभग चार दशक बाद 5 अक्टूबर 1946 को जवाहरलाल नेहरु को लिखे अपने ख़त में उन्होंने ‘हिन्द स्वराज’ का हवाला देते हुए स्वाधीन भारत के गांवों तक रेल पहुँचाने की बात की है। अपने आख़िरी दिनों में सम्प्रदियिक हिंसा देख वे यह भी मान चुके थे उनके साथ चलने वाले सत्याग्रहियों की अंहिसा दुर्बलों की अहिंसा थी, ‘निष्क्रिय प्रतिरोध’ था। जबकि अहिंसा हिम्मत और आत्मबल की माँग करता है। स्वतंत्रता दिवस से लगभग एक महीने पहले उन्होंने प्रार्थना सभा को संबोधित करते हुए अपने प्रवचन में कहा, ‘हम लाचारी से अहिंसक बने हुए थे, मगर हमारे दिलों में तो हिंसा भरी हुई थी। अब जब अंगरेज यहाँ से हट गए हैं तो हम उस हिंसा को आपस में लड़कर खर्च कर रहे हैं।’ गांधी इस संदेह से घिर गए थे कि किसीने उनके सत्याग्रह का अर्थ समझा ही नहीं, और सिर्फ उनका इस्तेमाल किया गया। अगर ‘फेक न्यूज़’ हमें हतोत्साहित करता है तो जरा सोचिये कि अपने जिए हुए यथार्थ को झूठा साबित होते देखना गांधीजी के लिए कितनी दुखद घटना रही होगी!

गांधी का सत्य खुदको परखने का सत्य है। इस सन्दर्भ में मैं अपना एक अनुभव साझा करने की इजाज़त चाहूँगा। पिछले साल आई.आई.टी. खड़गपुर के मेरे एक मित्र ने बताया कि उनके कैंटीन में थोड़े दिनों तक जूस नहीं मिल रहा था। पता लगा कि शहर में दंगे हो गए थे और फलों की सप्लाई बंद थी क्योंकि सप्लायर मुसलमान थे। सब्जियों के सप्लायर हिन्दू थे सुतरांग सैंडविच उपलब्ध था। दंगे की छानबीन करने पर पता चला कि व्हाट्सएप पर एक खबर फैली थी कि किसी मुस्लिम लड़की को घर छोड़ने गए एक हिन्दू लड़के की मोहल्ले के लोगों ने हत्या कर दी। इस घटना का पुलिस अथवा मीडिया के पास कोई ब्यौरा या प्रमाण नहीं था, लेकिन रातोंरात यह अफवाह कुछ भयानक तस्वीरें के साथ शहर भर में फ़ैल गई। अगले दिन हिन्दुओं ने मुसलामानों के दुकानों में लूटपाट की और कई दुकान जला दिए। तीसरे दिन मुसलामानों ने पलटवार किया और हिन्दुओं के दूकान लूटे। फिर कर्फ्यू लग गया और तब से कैंटीन में फलों की सप्लाई बंद हो गई। इस घटना के लिए तो मीडिया ज़िम्मेदार भी नहीं थी लेकिन फिर भी हिंसा फ़ैल गई। खबर अगर सच भी होती तो भी क्या इस तरह का हिंसापात जायज़ था? गांधी का सत्य का अनुसंधान हमें मीडिया या व्हाट्सएप को परखने तक सीमित नहीं रखता। वह हमें अपने भीतर झाँकने को ललकारता है। सामने वाला गलत हो तो भी मैं कैसे उसे जीत सकता हूँ? यह सवाल खड़ा करता है। बिहार और काठियावाड़ की घटनाओं की खबरें भले ही झूठी हों, लेकिन उनकी भर्त्सना करने की गांधी की प्रतिक्रिया सत्यपरक थीं।

गांधी का सत्य गहरी मानवीय चेतना का सत्य है। अरुंधती राय ने अपने निबंध ‘एक था डॉक्टर एक था संत’ (राजकमल प्रकाशन, 2019) में उन्हें राजा राममोहन राय, दयानंद सरस्वती और विवेकानंद की परंपरा से जोड़कर देखा है। ऐसा करते हुए उन्होंने गांधी की शख्सियत को घटाकर देखा है। राजा राममोहन राय, दयानंद सरस्वती और विवेकानंद राजभक्त थे, या कमसे कम राजा के विरुद्ध नहीं गए थे। गांधी का उद्देश्य केवल धार्मिक सुधार तक सीमित नहीं था। वे प्रजा और राजा, सबके भीतर के इंसान को एकसाथ ललकार रहे थे। अँगरेज़ जिस सांस्कृतिक श्रेष्ठता के दंभ के साथ हिन्दुस्तान पर शासन कायम रखते थे, गांधी के सत्याग्रह ने उसे उलट दिया था। वह आइना बनकर अंग्रेज़ों को उनकी अमानवीयता और क्रूरता का भान करवाता था। हमारी समझ से वे बुद्ध और येशु के उत्तराधिकारी हैं, और अपने तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद हमारी सभ्यता के युगपुरुष हैं। यह आकस्मिक नहीं है कि आज सविनय अवज्ञा, सत्याग्रह, और शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन दुनिया भर में प्रतिरोध के कारगर तरीके हैं।

इस सन्दर्भ में मुझे स्लोवेनियन दार्शनिक स्लावोय ज़िज़ेक के साक्षात्कार याद आते हैं, जिनमें वे अक्सर मार्क्स की बात को उलटकर कहते हैं कि ‘पिछली शताब्दी में कई लोगों ने दुनिया बदलने की कोशिश की है। अब ज़रुरत है उसकी व्याख्या करने की।’ इसी समझ को विकसित करने में गांधी हमारी मदद करते हैं। मार्क्सवाद एक वैज्ञानिक और अर्थनैतिक सिद्धांत है जिसमें प्रगति द्वंद्वात्मक पद्धति से संभव हो पाता है। फ्रायड इसी प्रगति को क्रमिक विकास की तरह देखते हैं। लेकिन गांधी के लिए सिर्फ प्रगति मायने नहीं रखती। हिंद स्वराज में उनका रेलवे, डॉक्टर, और वकीलों का विरोध इसी बात की पुष्टि करता है। वे अनिवार्यतः सभी चीज़ों को नीति के दायरे में लाकर जांचते परखते हैं। इस मामले में वे हमारी ‘समय’ अथवा ‘काल’ की सामान्य समझ को ट्रांसेंड करते हैं। उनमें अतीत मोह भी है और भविष्य मोह भी। मार्क्स की यूटोपिया एक भविष्यगत संरचना है, लेकिन गांधी की यूटोपिया भूत, वर्तमान, और भविष्य में एक साथ है। इसे हासिल करने का संघर्ष सामाजिक होकर भी निजी है। तभी तो वे केवल साध्य नहीं, साधन की भी बात करते हैं। जबतक आदमी है, हिंसा रहेगी, और इसलिए गांधी भी प्रासंगिक बने रहेंगे।

गांधी की यूटोपिया यानी ‘रामराज्य’। उनकी ऐसी कई बातें हैं जिनके अर्थ आज उलट दिए गए हैं। जब व्यक्ति अपनी व्यक्तिकता से बढ़कर मिथ में बदल जाए तो ऐसा होता है। गांधी के राम और हिंदुत्व के राम में उतना ही फर्क है जितना ‘हे राम’ के उच्छ्वास और ‘जय श्री राम’ की धमकियों के बीच। राम की जिस छवि को हिंदुत्व हमारे सामने रखता है, उसमें राम क्रोधित हैं, उनके बाल खुले हुए हैं और वे धनुष लेकर लड़ने की मुद्रा में खड़े हैं। वे यह भूल चुके हैं कि पूरे रामायण में राम कभी किसी व्यक्ति पर क्रुद्ध नहीं हुए। मेरे अपने शहर बेंगलुरु में अधिकाँश टैक्सियों के पीछे गुस्सैल हनुमान की भगवा रंग की तस्वीरें लगाने का ट्रेंड चल पड़ा है। ये कौन से हनुमान हैं, मैं नहीं जानता! इसी तरह गांधी के ‘स्वदेशी’ का अर्थ गांवों के मूलभूत विकास से उलटकर भारतीय करोड़पतियों के ब्रांड का सामान खरीदना भर रह गया है। हमारे समय का एक बाबा खुलकर विज्ञापनों में इसका प्रचार करता है। गांधी के लिए चरखा चलाना एक पोलिटिकल स्टेटमेंट था। हमारे नेताओं के लिए यह कैलेन्डर में चिपकाए जाने की तस्वीर खिंचवाने के सुअवसर से बढ़कर कुछ नहीं है। जीवनभर ब्रह्मचर्य से उर्जा लेने वाले गांधी आज नवयुवक-युवतियों के बीच सबसे अधिक नॉन-वेज चुटकुलों में आते हैं। कमसे कम हमारी पीढ़ी के साथ तो ऐसा ही था। यह जॉर्ज ऑरवेल के 1984 उपन्यास के डबलस्पीक जैसा है, जिसमें शब्दों का अर्थ उलट दिया गया है। इस सन्दर्भ में मुझे केदारनाथ सिंह की कविता ‘बुद्ध की मुस्कान’ (ताल्सताय और साइकिल) स्मरण हो आती है –

‘मेरी समस्या यह है
कि वह कौन-सा नियम है भाषा का
जिससे पोखरण में होने वाला बम-विस्फोट
चुपके से बन गया था बुद्ध की मुस्कान।’

कल को अगर गांधी के सत्य का अर्थ झूठ और धोखाधड़ी हो जाए तो भी क्या हमें आश्चर्य होगा!

अपनी बात ख़त्म करने से पहले मैं ‘हिन्द स्वराज’ को एक आखरी बार उधृत करना चाहूँगा। गांधी ने कांग्रेस के संस्थापक ह्यूम का हवाला देते हुए कहा था, ‘हिन्दुस्तान में असंतोष फैलाने की ज़रुरत है। यह असंतोष बहुत उपयोगी चीज है। जबतक आदमी अपनी चालू हालत में खुश रहता है, तब तक उसमें से निकालने के लिए उसे समझाना मुश्किल है। इसलिए हर एक सुधार के पहले असंतोष होना ही चाहिए।’ गांधी के सिखाये त्याग और सादेपन से हम बहुत आगे निकल आये हैं। आज हम उपभोक्तावाद और व्यक्तिवाद के दौर में जी रहे हैं, जो इस असंतोष से ही उपजी है और उसे बढ़ा भी रही है। ज़ाहिर है हमारे अखबार अपने पहले पन्ने जैसी पवित्र जगह भी कपड़े, कार, मकान और नेताओं के विज्ञापनों को दे देती है। सत्ताएं भी इस असंतोष को सुलझाने के लिए जनता का बुनियादी उत्थान टालकर उन्हें मुफ्त की चीज़ें बाँटने में लगी रहती है। लेकिन इनसे असंतोष कम नहीं होगा। समय के साथ यह बढ़ता जाएगा और आज नहीं तो कल हमें अपने भीतर और अपने समाज के भीतर झाँकने पर मजबूर करेगा। इस ऐतिहासिक ज़रुरत का सामना हर सभ्यता को अलग अलग समय पर करना पड़ता है, और यह सत्ताओं और मीडिया के नियंत्रण के बाहर की चीज़ है। सत्ता, आवाम, और मीडिया, सबको अपने अपने गिरेबान में झांकना पड़ेगा। और तब गांधी और उनके विचार हमारे सबसे अधिक काम आयेंगे।

रज़ा फाउंडेशन द्वारा आयोजित युवा 2019 में पढ़ा गया पाठ।

***

बेंगलुरु निवासी सौरभ राय कवि, अनुवादक और पत्रकार हैं. स्वतंत्र लेखन के अलावा ये ऑनलाइन पत्रिका 'बेंगलुरु रिव्यू' का संपादन करते हैं।

Like
Comment
Loading comments