मोहन राकेश का नाटक ‘आधे अधूरे’ : एक अनूठी प्रस्तुति

Forgot password?

Delete Comment

Are you sure you want to delete this comment?

मोहन राकेश का नाटक ‘आधे अधूरे’ : एक अनूठी प्रस्तुति

सुरभी घोष चटर्जी का आलेख।

"एक पहलू जिसने इस प्रस्तुति को अद्भुत बनाया वो था नेपथ्य में चल रहा छायाओं का खेल," सुरभी घोष चटर्जी लिखती हैं।

नाट्य जगत में मोहन राकेश और उनकी कृति ‘आधे-अधूरे’ को किसी तरह के परिचय की आवश्यकता नहीं है। आधे अधूरे का मंचन न जाने कितने लोगों ने कितनी ही बार किया है। १९६९ में लिखी गई ये कहानी अपने समय से जितनी आगे तब थी उतनी ही आज भी है। मैंने ये नाटक कुछ सालों पहले ‘सिने प्ले’ के रूप में देखा था। जिसमें नाट्य जगत के जाने माने कलाकार मोहन अगाशे और लिलिट दुबे ने मुख्य किरदार निभाए थे। उस वक़्त मुझे लगा था कि इस कहानी को इससे अच्छी तरह से प्रस्तुत करना शायद और किसी के लिए मुमकिन न हो।

जब बैंगलोर की नाट्य कंपनी  ‘Theatre on your own’ या TOYO के इस नाटक को अलग ढंग से प्रस्तुत करने के बारे में पढ़ा तो मेरी अपेक्षा बस इतनी थी की इस नाटक का साहित्य जगत में जो स्थान है उसका ध्यान रखते हुए, इसे ईमानदारी से निभाया जाए। इनकी ये कोशिश मेरी अपेक्षा पर कितनी ख़री उतरी ये तो आप लेख के आख़िर तक जान ही जाएंगे। लेकिन प्रस्तुति शुरू होने तक ये आशंका बनी हुई थी, कि क्या इस नाटक को मोहन अगाशे वाले नाटक के बराबर करना मुमकिन है? ना भी हो, तो क्या ये प्रस्तुति इस नाटक के स्तर के साथ न्याय कर पाएगी?

सबसे पहले या बता दूँ की ये प्रस्तुति इस नाटक की ‘dramatic reading’ थी। ये TOYO की पहल ‘चुस्की नाटक की’ का हिस्सा था जिसमें नाटक जगत की कुछ श्रेष्ठ कृतियों को नाटकीय तरीके से पढ़ा जाता है। ये प्रस्तुति बंगलौर के ‘Yours Truly Theatre’ में हुई और इस जगह की भी अपनी ही ख़ासियत है। यहां बड़े रंगमंचों की तरह दर्शक और कलाकार एक दूसरे से दूर अजनबियों की तरह नहीं, बल्कि ऐसे बैठते हैं जैसे वे भी नाटक का हिस्सा ही हो।

नाटक की शुरुवात में कथावाचक ने बहुत ही संक्षिप्त में मोहन राकेश से हमारा परिचय करवाया, मुझे अच्छा लगा लेकिन अद्भुत नहीं। मैंने तब तक यही सोचा ये प्रस्तुति ऐसे ही आगे बढ़ेगी - आख़िरकार ‘ड्रमैटिक रीडिंग’ को और कितना ड्रमैटिक बना सकता है कोई? लेकिन जल्दी ही मेरी ये आशंका दूर हो गई, जैसे जैसे एक एक कलाकार अपने किरदार को निभाने लगे मेरे लिए हर एक किरदार जीवंत होने लगा ठीक वैसे जैसे मोहन अगाशे के नाटक में हुआ था।  हो सकता है नाट्य जगत के दोस्त इसे अतिश्योक्ति कहें, पर मेरी भावनाएं उस वक़्त यही थीं।

ऐसा क्यों हुआ इसके कई कारण हैं, कुछ छोटे-छोटे लेकिन ठोस, और कुछ उनसे बड़े। कुछ छोटी छोटी बातें जिन्होंने इस प्रस्तुति को इतना अनूठा बनाया वो ये थीं -

  • स्टेज की सेटिंग - जिस जगह ये हुआ उसकी ख़ासियत मैं बता चुकीं हूँ।
  • मंच पर रखे सामान व प्रॉप्स - ये सब हाथों से तैयार किये गए थे ‘रेडी मेड’ नहीं थे, यहाँ तक कि सबसे आगे रखे लैंप भी।
  • रौशनी का इस्तेमाल - ये पहली बार था कि मैंने देखा रौशनी का इस्तेमाल ऐसे किया गया हो जैसे वो भी नाटक का एक पात्र हो।

ये तो हुए कुछ छोटे लेकिन बहुत महत्वपूर्ण हिस्से। लेकिन वो पहलू जिसने इस प्रस्तुति को इतना अद्भुत बनाया वो था नेपथ्य में किया गया छायाओं का खेल (shadow play)। मुझे ये नाटक का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा इसलिए लगा क्योंकि मोहन राकेश के इस नाटक में हर किरदार यूँ तो बहुत कुछ कहता है, वो सावित्री हो, महेन्द्रनाथ हो या फिर बिन्नी, सब बहुत कुछ कहतें हैं, लेकिन ऐसा बहुत कुछ और भी है जो दर्शकों को समझने के लिए छोड़ जातें हैं। ये बिन कहे, कहे जाने वाली बातें इस नाटक का एक बहुत महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।

छायाओं   से नाटक के इस मर्म को ना केवल बहुत ही खूबसूरती से दिखाया गया पर बहुत ही उम्दा तरीके से निखारा भी गया। इन तस्वीरों से कुछ अंदाज़ा हो शायद।

लेकिन उस वक़्त वहां बैठकर ये सब मंच पर एक साथ होता हुआ देखना - छायाओं का खेल, जीवंत होते हुए पात्र, रौशनी का अद्भुत प्रयोग … एक अद्वितीय अनुभव था। पात्रों के अंतर्द्वंद को इस तरह की प्रस्तुति ने इन्हें और भी जीवंत और प्रबल तरीके से दर्शकों को सामने रखा। उस वक़्त हम भी वो एक एक पात्र बनते जा रहे थे, जो मंच पर थे।

क्या ये प्रस्तुति इससे बेहतर हो सकती थी या कुछ ऐसा था जो और बेहतर किया जा सकता था? हाँ शायद, शुरुवात का वृतांत और रोचक हो सकता था थोड़ा छोटा भी। इसके अलावा, मुझे ये प्रस्तुति बहुत ही अलग और अद्भुत लगी और ऐसा कुछ बैंगलोर के नाट्य जगत में हो रहा हो ऐसा मेरी जानकारी में नहीं है। तो अगली बार जब ये ‘ड्रमैटिक रीडिंग’ फिर से हो तो इसे ज़रूर देखिएगा।

ये इवेंट Theatre on your own द्वारा, 16 सितम्बर, शाम 7 बजे से ‘Yours truly theatre’, इंदिरानगर में किया गया था।

Source: Live Mint
Source: Live Mint

सुरभी घोष चटर्जी बेंगलुरु में रहती हैं, कविताऐं पढ़ने और लिखने में रूचि रखती हैं। साथ ही साथ साहित्य के अलग अलग पहलूओं के बारे में - कहानियाँ, नाटक इत्यादि, समझने की कोशिश कर रहीं हैं।

Like
Comment
Loading comments