बीबी: बेंगलुरु के पीजी में बीती ज़िन्दगी को समेटती कहानी

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बीबी: बेंगलुरु के पीजी में बीती ज़िन्दगी को समेटती कहानी

अंशुमन आचार्य की कृति।

बीबी का नाम दरसल बीबी ही था या हमसे पहले के लड़के छोड़ के चले गए थे, यह मैं नहीं जानता. जब मैं बैंगलोर पहुँचा तो उनके एक गराज भर रसोई को “बीबीज़ किचन” (Bibi’s Kitchen) ही बोला जाता था, हालांकी वहाँ इस नाम का कोई बोर्ड-वोर्ड नहीं लगा था.

चार घी-चुपड़ी रोटियाँ, एक तश्तरी भर चावल, दो तरकारी, एक दाल, जिस पर फिर एक घी का लोंदा पारे की तरह तैर रहा होता था. और इस पूरी थाली का दाम बीस रुपए. जो की उस ज़माने के मापदंड से भी काफ़ी सस्ता था. हम उत्तर भारत से आए लड़कों को और क्या चाहिए था - हर रात वहीं खाते थे. हाँ, माँस-मच्छी वालों को कभी-कभार अपनी तलब कहीं और जा कर पूरी करनी होती थी.

यह वो समय था जब बैंगलोर में आईटी कम्पनीयों का आना शुरू ही हो रहा था. मुझे याद है कि यहाँ की जनता तब हम नार्थ से आए लड़कों को ऐसे देखा जाता था जैसे नए-नए मॉल में लगे एस्केलेटर को - कि भाई, यह क्या बला है? हाँ, थोड़ा बहुत रोष था, पर आज जितना नहीं. हमारी तब आज जितनी तादाद भी नहीं थी - अब तो कुछ इलाक़ों में ऐसा लगता है की चीर के पेड़ों की तरह हम पूरा का पूरा परबत ही निगल गए हैं.

कॉलेज के बाद मेरी पहली नौकरी थी और साउथ में पहला प्रवेश. मेरा मकान-मालिक उन पथ प्रदर्शकों में था जिसने हमारे आने वाले ज्वार को भांप लिया था और अपने तीस बटा चालीस मकान के दो ऊपरी फ़्लोरों में किसी तरह से बारह बिस्तर घुसा कर पीजी बना दिया था. ढाई हज़ार के किराए पर कुल मिला के हमसे महीने के तीस हज़ार बनाता था, उस ज़माने में, लौंड्री और खाने का अलग लेता था, और उसके बाद भी, हर शाम, कभी हमारे हँसी-ठट्ठे पर, कभी हमारे टू इन वन के वॉल्यूम पर नीचे से ऐसे चिल्लाता था कि लगता था कि सर की नस फटने वाली हो उसकी. पंप तभी चलता था जब नलों में मारे सूखे के पानी के बजाय ख़राश की आवाज़ आने लगती. और कभी-भी, सी आई डी की तरह रेड मार सकता था, कि कहीं हम किसी मेहमान - ख़ासकर लड़की - को तो नहीं स्मगल करके ले आए हैं? या बाथरूम में एक से ज़्यादा बालटियाँ तो नहीं रखी हैं? मुझे आज भी याद है कि जब नीचे जाओ तो बाहर बंडी और लूँगी में घूमता मिलता और हमें देख कर “ब्लडी नार्थ-इंडियन्स!” हुंकारता. हमने उसका कोड नाम ही बी.एन.आई. रख दिया, और उसी के सामने इस्तेमाल करते - कि यार, आज बी.एन.आई. बहुत बास मार रहा है. या, बी.एन.आई. नीचे मँडरा रहा है, ऊपर से बालटी उँड़ेल दें?

यहाँ पर मैं एक बात साफ़ कर दूँ कि इन बी.एन.आई. जनाब को मैं बैंगलोर के तमाम मकान मालिकों की एक मिसाल बना कर बिलकुल पेश नहीं कर रहा. वो बस पैदाइशी काइयाँ था - यहाँ का हो या कहीं और का. उसकी ख़ुद की बीवी और बीस साल का लड़का उससे परेशान और शर्मिंदा थे, और जितनी अकड़ और ओछापन वो हमें दिखता उससे कहीं ज़्यादा तो अपने परिवार पर. उनसे ऐसे बात करता था जैसे दुलत्ती मार रहा हो, ख़ासकर आंटी से. मोहल्ले में किसी से उसकी नहीं बनती थी, और कितनी ही बार उसकी किसी बदतमीज़ी के बाद आंटी बेचारी को हाथ जोड़ कर पीछे से माफ़ी माँगने जाना पड़ता.

ख़ैर, इन बी.एन.आई. अंकल को इस बात की बहुत चिढ़ थी कि उसके इतने प्यार-सत्कार के बावजूद हम बीबी के यहाँ खाते थे. भाई, बारह लड़कों का बीस रुपए थाली के हिसाब से रोज़ दो सौ चालीस का नुक़सान जो हो रहा था उसका. मेरे से पहले आए हुए लड़के बताते थे कि बीबी के किचन के पहले वो अपना ख़ुद का किचन चलाता था, जहाँ एक थाली का वो तीस रुपए लेता था और सिर्फ़ चावल, रसम और एक मरगिल्ली सब्ज़ी देता था. सलाद का अलग लेता था. पर बीबी के किचन के बाद उसने झट से अपने भी दाम बीस रुपए कर दिए और बीबी के दो उड़िया बावरचियों के टक्कर में अपना भी एक उड़िया बावर्ची बैठा दिया, जिसने रोटी-दाल बनानी शुरू भी की - पर तब तक बीबी अपनी घी-चुपड़ी चालबाज़ी से पूरा मैदान साफ़ कर चुकी थी, और एक महीने में जब कोई ग्राहक ही नहीं रहा, तो ना रहा किचन, ना वो उड़िया बावर्ची. रह गया तो बस “ब्लडी नार्थ-इंडियन्स!”

यह सब मेरे आने के पहले का क़िस्सा है. जब तक मैं पहुँचा, तब तक बीबी का किचन सिर्फ़ हमारे पीजी को ही नहीं, बल्कि अग़ल-बग़ल के कितने ही महल्लों के लड़कों का ठिकाना बन गया था. कुछ लड़कियाँ भी आती थीं, जिन्हें बीबी अलग बैठाती थीं और उन पर ऐसे निगरानी रखती थीं जैसे उनकी बुआ हों.

उस वक़्त बीबी की उमर कुछ पचपन के आसपास रही होगी. अगर शायद आठ-दस बरस भी कम होती तो हम शृंगार-रस के व्याकुल लड़के उन्हीं पर थोड़ी-बहुत आँख सेंक लेते. क्यूँकि इस अधेड़-अवस्था पर भी यह ज़ाहिर था की वो जवानी में निहायत ख़ूबसूरत रही होंगी. इसको ले कर हम कुछ लड़के उनकी चिकाई भी लेते थे - कि बीबी, पहले क्यूँ पैदा हो गयी इतना? और हो भी गयी तो हमारे लिए अपनी जैसी कोई लड़की तो ले आती - ज़िंदगी भर घर-जमाई बन कर रुक जाते, और मुफ़्त में रोज़ यहीं खाते. जिस पर बीबी झूठ-मूठ की हाय-तौबा करतीं.

हम तीन-चार लड़के उनसे ज़्यादा घुल-मिल गए थे. हमारा आना-जाना सिर्फ़ उनके किचन तक ही नहीं, बल्कि ड्राइंग-रूम तक था, जहाँ बैठ कर हमने कितने ही क्रिकेट मैच देखे. यह रिश्ता भी मेरे आने के पहले बन चुका था. मैं भी उन दोस्तों के साथ एक शाम बीबी के ड्राइंग-रूम पहुँचा और बस - उस मंडली में शामिल हो गया. पर उन दर्जनों लड़कों में से सिर्फ़ हम लड़के ही क्यों?

शायद इसकी थोड़ी बहुत वजह यह थी की हम सब थोड़े मिलनसार और मुँहफट मिज़ाज के थे, जो किसी की भी दी हुई ऊँगली को पहुंचा बनाने में हिचकते नहीं थे. और बीबी तो पहुंचा क्या, पूरी की पूरी बाँह देने वालों में सी थीं. वहाँ हम उनके सोफ़े पर बैठे मैच देख रहे होते, और वहाँ वो चाय-पकौड़ों का तांता बनाए रखती.

बीबी अकेले रहती थी, बिलकुल. जो एक साल मैं उस पीजी में रहा, मैंने कभी किसी रिश्तेदार को उनके यहाँ आते-जाते नहीं देखा. मुझे उनके बारे में बस इतना पता था की वो किसी ज़माने में भरत्नाट्यम डांसर थीं, क्यूँकि उनके ड्राइंग-रूम में एक पूरी ताक उनकी ट्रोफ़ियों से सजी थी. मैंने एक बार पूछा भी पर उन्होंने ऐसे टाल दिया जैसे शौक़िया कभी इधर-उधर नाच लेती थी. इन ट्रोफ़ियों के अलावा उनके घर में सिर्फ़ किताबें ही किताबें थीं - पुरानी अंग्रेज़ी साहित्य की - जिन्हें दिन में वो अपने बाल्कनी में बैंगलोर की नरम धूप में पैर पसार के पढ़ती थीं. हमारी टोली को भी साहित्य का बहुत शौक़ था, जो शायद बीबी के साथ हमारी घनिष्टता की सबसे बड़ी वजह थी. बीबी अक्सर शाम को हम बुद्धीजीवियों को बैठा कर साहित्य और कला पर चर्चा करते सुनती और बहुत मज़ा लेती - हालांकी ऐसी कोई किताब ना थी जो उन्होंने पढ़ी ना हो, ऐसा कोई तर्क जो उन्होंने ना सुना हो.

बीबी और मुझे, दोनों को उन्नीसवी सदी के रूसी लेखकों में बेहद दिलचस्पी थी, और साथ ही साथ आर डी बर्मन, आशा, किशोर और गुलज़ार में भी. शायद इसलिए उनकी मुझसे थोड़ी ज़्यादा ही पटती थी. बीबी कभी किसी को अपनी किताबें पीजी तक ले जाने नहीं देती थीं - मेरे अलावा. इस शर्त पर की मैं उसमें एक शिकन नहीं आने दूँगा, और किसी को नहीं बताऊँगा कि वो किताब उन्होंने दी है. कितनी ही शाम हम दोनों अकेले बैठ के किताबें पढ़ते, और अपने पसंदीदा गाने सुनते उनके फिलिप्स के टू-इन-वन पर. जैज़ से मेरा परिचय उन्होंने ही कराया था.

मेरे बैंगलोर आने के चंद महीनों बाद मेरे माता-पिता भी तीन-चार दिन मेरा हाल देखने आए. मेरे पीजी में तो जगह थी नहीं, इसलिए बग़ल के एक होटल में रुक गए, और मैं भी उनके साथ ही रहा. वो तीन-चार दिन बिलकुल जैसे फिर से बचपन. एक दिन का मैसूर का चक्कर भी लगाया. वो जब मेरी पीजी में आए तो मैंने सभी लड़कों को बता दिया था कि अश्लील पोस्टर्स उतार दें, और गाली-गलौज पर जितना रोक लगा लें उतनी मेहेरबानी होगी. हम सब हॉस्टल से आए थे इसलिए किसी के माँ-बाप के आने की ड्रिल से वाक़िफ़ थे. पर मकान मालिक नहीं. मैं अपने माता-पिता को अपना कमरा दिखा रहा था, की अचानक धड़ल्ले से अंदर घुस कर ऐसे पूछताछ करने लगा जैसे कोई चोर-उचक्के हों. यस? हू आर यू?

उसकी इस बदतमीज़ी पर मेरा तो माथा ठनक गया. पर इससे पहले मैं कुछ बोलता या करता - मेरे पापा ने उसे बड़ी शांति से ऊपर से नीचे देखा और पूछा कि आप हैं यहाँ के मकान मालिक? कमर्शियल लाइसेंस रखे हैं? कानून के हिसाब से सारी इजाज़तें ले लीं हैं, वो सहूलियतें दे रहें हैं ना?

पापा ने पीठ के पीछे हाथ पकड़ कर बिलकुल ऐसा टशन अपना लिया जैसे कोई आईपीएस अफसर खड़ा हो. माँ और मैंने एक दूसरे को कनखियों से देखा. दरसल मेरे पिता एक डॉक्टर थे, और बहुत ही नरम स्वभाव के. पर आदमी परखने में उस्ताद और उससे भी उस्ताद किसी की नक़ल करने में. अभी वो हमारे एक पारिवारिक मित्र मिस्टर सिन्हा, जो की आईएस अफसर थे, उनकी नक़ल कर रहे थे. बिलकुल वैसी आवाज़ और अन्दाज़. माँ और मैं तो किसी तरह हँसी रोके खड़े थे, पर बी.एन.आई. की हालत पस्त. बड़बड़ाने लगा, एक डरी हुई, झेंपी हुई मुस्कान देकर उलटे पैरों निकल लिया - मैं तो हाथ मलते रह गया कि काश एक कैमरा होता और मैं इस डरे खीजे चेहरे को उसमें खींच कर अपनी अलमारी में टाँग देता.

ख़ैर, उसके जाने के बाद हम बहुत हँसे, और फिर मैं दोनो को बीबी के किचन ले गया. शाम का वक़्त था और किचन अभी खुल ही रहा था. बीबी टेबल के पीछे खड़ीं अपने छोटे से स्टाफ को हिदायतें दे रहीं थी. मैंने अपने माता-पिता को उनसे मिलाया. बीबी उनको देख कर ख़ुश तो हुईं, पर साथ ही, पता नहीं, मुझे उनमें एक झिझक दिखी. शायद वो इस दुविधा में थी की उनके सामने वो मुझसे किस अन्दाज़ में बात करें. उन्होंने एक लड़के को अंदर से चाय लाने को भेजा और फिर थोड़ी देर माँ से बात की. पर उनमें अभी भी मुझे वो हल्की सी हड़बड़ाती उलझन दिख रही थी. जैसे उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि मेरे माता-पिता से किस अन्दाज़ में पेश आए - हम 23-24 साल के लड़कों की बीबी या - ख़ुद की तरह?

पर उनका वो ख़ुद था क्या? - हम लड़कों ने तो कभी सोचा ही नहीं था. जिस तरह मकानमालिक को बी.एन.आई. बना दिया, उनको बीबी. जैसे हमारे लिए उपयुक्त उस नाम के अलावा उनकी ख़ुद की कोई शख़्सियत ही ना हो. ख़ैर, चाय पी कर जब हम वापिस होटेल के लिए निकले तो माँ ने पापा को बताया कि - इंदौर से है. पंद्रह साल से है यहाँ. ख़ुद को विधवा बता रही है. पता नहीं ख़ुद का घर है या किराए का.

पता नहीं क्यों मागे मुझे माँ की इन टिप्पणीयों पर थोड़ा ग़ुस्सा आया. दूसरों के मामलों में तांक-झाँक करने की उनकी पुरानी आदत थी. माना हम लड़कों ने बीबी को अपनी सहूलियत की बीबी के आगे ही नहीं देखा, पर जिस बीबी की हमने उनको पहचान दी थी वो उनकी ख़ुद की मर्ज़ी की थी. अचानक उस बीबी को माँ ने एक पासपोर्ट की शिनाख्त की तरह उनके शहर, पता, वैवाहिक दशा की संकुचित पहचान में पाबंद कर दिया. जिसमें ना उनकी वो उदारता थी, ना वो बोध जिससे हम लड़के उन्हें जानते थे. और उस पहचान में भी एक शक का साया: “ख़ुद को बता रही है”. मतलब हो सकता है झूठ बोल रही हो. पति से भाग कर आयी हो यहाँ. या किसी और नजायाज इतिहास से.

मैं पलट कर बोलना चाहता था - कि वो जहाँ से हो, जो भी इतिहास हो, उससे क्या फ़र्क़ पड़ता है. वो आज बीबी हैं - और उन्हें उससे ज़्यादा कुरेदने की कोई ज़रूरत नहीं हैं. पर दो दिन में माँ वापिस जाने वाली थी, इसलिए मैं यह बातें अंदर घोंट कर पी गया.

इस दौरान मेरा ऑफ़िस में एक दोस्त के साथ थोड़ा बहुत रोमांस शुरू हो गया था. थोड़ा बहुत मतलब हम पार्क और सिनेमा घर में बैठ कर हाथ पकड़ते, एक-दो पप्पी ले लेते. ज़ाहिर है, एक बाइस साल का गबरू जवान इस नज़दीकी को और बेतकल्लुफ़ी की तरफ़ ले जाने की हर वक़्त फ़िराक़ में रहेगा. पर उस के लिए एक बंद कमरे की ज़रूरत थी जो ना उसके पास था ना मेरे पास. होटेल के कमरे का तो सवाल ही नहीं उठता था - हम दोनो शरीफ़ ख़ानदान वाले थे, और फ़िलहाल इतना आगे जाने का इरादा भी नहीं था. फ़िलहाल. मुझे तब बीबी का ख़याल आया - कि वो मदद कर सकती हैं. हमारे अदबी चर्चों में अक्सर सेक्स, ख़ासतौर पर उसके प्रति समाज की सोच, पर विवेचन होता था, और इसमें बीबी का भी वही नज़रिया था जो हम लड़कों का - कि यह बंदिशें एक पुरुष-प्रधान समाज की दकयानूस सोच का नतीजा था. मुझे याद है एक बार बीबी ने अचानक तड़ाक से हम सब से एक-एक कर के पूछा था की क्या हम किसी ग़ैर-कुँवारी लड़की से जानते हुए शादी कर लेंगें. सबने हाँ कहा पर इस शर्त पर कि वो ख़ुद भी वो अनुभव कर चुके हों. मैंने अकेले बहुत विश्वास से कहा था कि चाहे मैं कुंवारा हूँ या ना हूँ, मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ेगा. कि वैवाहिक हो या अवैवाहिक, सेक्स कोई धब्बा नहीं है जो किसी के चरित्र पर चढ़ जाए. और मेरे इस जवाब से बीबी ख़ुश भी बहुत हुईं थी.

तो बस - हमारी इस मुश्किलात में बीबी से बढ़िया कौन हो सकता था मदद करने को. तो एक शाम ऑफ़िस के बाद मैं पहुँच गया उनके ड्राइंग-रूम में उस लड़की को ले कर. पर बीबी ने उसे मेरे साथ देखा तो ऐसे ठिठक गयी जैसे मैं मिनी-स्कर्ट और टैंक-टॉप पहनी किसी ऊज़्बेक सहचरी को ले आया हूँ. वो तड़ से समझ गयीं थी कि मैं उसे वहाँ उनसे बस मिलाने नहीं लाया हूँ, पर उससे बढ़ के कुछ अपेक्षाओं रख कर आया हूँ. आज जब मैं इस हादसे के बारे में सोचता हूँ तो बीबी के नज़रिए को समझ पता हूँ. कि भई सही में, इन लड़कों के साथ थोड़ी हँस के बात-चीत कर ली, इन लोगों ने तो मेरे घर को कोई घंटे के हिसाब वाला होटेल समझना शुरू कर दिया है. हालांकि हम उनके पास कोई कमरे की उम्मीद नहीं, बस पल दो पल के एकांत की उम्मीद में गए थे. जिसे भंग करने कोई पुलिसवाला लाठी मारते हुए, या कोई टकटकी बांधे ठरकी अंकल ना आए. पर ठीक है - बीबी की आपत्ति जायज़ थी. पर उनकी तो प्रतिक्रिया ऐसी थी जैसे कोई साँप सूंघ गया हो. मैंने लड़की का परिचय दिया और वो हूँ-हूँ करती गोल-गोल आँखें से उसे ऐसे देख रही थीं जैसे मैं कोई आतंकवादी ले आया हूँ पनाह की तलाश में. अरे, जगह देने में मना करना था तो कर देतीं, पर ठीक से मिल तो लेतीं. चाय-पानी तो छोड़िए, उसे बैठने तक को नहीं पूछा. बस खड़ी-खड़ी उसे घूरती रहीं जैसे किस चाल-चलन की लड़की हो. वो बेचारी भी शर्म के मारे लाल हो रही थी. मुझे बीबी पर बड़ा ग़ुस्सा आया और नमस्ते करके चला गया. समझ आ गया की बीबी के आधुनिक ख़यालात सिर्फ़ चाय पर चर्चों तक ही थे.

इस हादसे के बाद मैं बीबी के यहाँ कई दिनों नहीं गया. पहले तो उनके बर्ताव का ग़ुस्सा था, पर फिर यह ग़ुस्सा भी आने लगा कि वो ना ख़ुद माफ़ी माँगने आ रही हैं, ना किसी के हाथ बुलावा भेज रही हैं. उस वक़्त हम सब अलग-अलग प्रोजेक्ट में दिन-रात लगे हुए थे, इसलिए बीबी के यहाँ की बैठक का मौक़ा ही नहीं मिल रहा था. और मैं ऑफ़िस के पास के एक रेस्तरां में खाने लगा था - उसी लड़की के साथ. इसलिए दोस्तों को बीबी और मेरे बीच के तनाव का अंदेशा नहीं मिला.

पर यह तब तक ही मुमकिन था जब तक हम सब अपने-अपने प्रोजेक्ट में व्यस्त थे. ये प्रोजेक्ट समुद्र के ज्वार-भाटा की तरह होते थे, कभी लहराते हुए आगे बढ़ गए, फिर पीछे हट गए. इसलिए मुझे यह तश्वीश तो रहती थी की एक दिन आएगा जब सब फिर से फ़ारिग़ होंगें, और उनको मेरे और बीबी के बीच हुए मनमु टाव के बारे में पता चल जाएगा. ख़्वामखाह बात का बतंगड़ बन जाएगा और उस बेचारी लड़की का भी नाम बीच में खींच आएगा. पर इससे पहले ऐसी कोई शाम आती, एक ऐसा हादसा हुआ जिसने सब हमेशा के लिए ख़त्म कर दिया.

बैंगलोर में वो गली ही क्या जिसकी चौकिदारी एक कुत्तों का झुंड ना कर रहा हो. ऐसे ही हमारी गली में 5-6 कुत्तों का झुंड था जिनकी अन्नपूर्णा थी हमारी बीबी. अपने किचन से निकला खाना इन कुत्तों को देतीं, और सिर्फ़ इतना ही नहीं, उनके टीके और इधर-उधर की दवाई-मलहम का भी ध्यान रखतीं. ज़ाहिर है कुत्ते उनके बड़े वाफ़ादार थे. कॉलोनी में कई लोग इन कुत्तों की आफ़त का इल्ज़ाम बीबी के सर थोपते थे, हालांकी, जैसा मैंने कहा, सब जानते हैं की बैंगलोर में कोई मेन या क्रॉस नहीं है, जहाँ किसी ना किसी झुंड ने डेरा ना बिठाया हो. बीबी बस उनकी थोड़ी बहुत देख-भाल कर लेती थीं.

एक दिन, दोपहर के वक़्त, इस झुंड में से एक कुत्ता सड़क के बीच लेटा धूप ले रहा था, की अचानक सपाट से एक गाड़ी आयी, और इससे पहले वो बेचारा अपने टहन्नी-भर टांगों पर उठ पाता, उस बेचारे पर चढ़ गयी. उसकी काँय-काँय सुन कर बीबी भागती हुई बाहर आयी और देखा की गाड़ी-वाला रिवर्स कर रहा है ताकि उस घायल कुत्ते के बग़ल से काटता हुआ चलता बने. बीबी ने उसका बोनट पीट कर उसे रोका और फिर उनकी जो उससे बहस हुई की पूरी कॉलोनी तमाशा देखने बाहर आ गयी. ड्राइवर हमारी उमर का लड़का था. मैं तो उस वक़त वहाँ मौजूद नहीं था पर लोग बता रहे थे की बड़ी अकड़ और बदतमीज़ी से बात कर रहा था. शायद वो कुत्ता एक गाय होता तो बीबी कुछ ठोस कर भी पातीं, पर सिवाय उस लड़के को खरी-खोती सुनाने के अलावा, और वो भी कन्नड़ में, वो कुछ नहीं कर पायीं. ख़ुद ऑटो लेकर के उस कुत्ते को तुरंत अस्पताल ले गयीं, पर उस बेचारे ने उसी में बीबी के गोद में दम तोड़ दिया. शाम को हम कुछ लड़कों ने एक ख़ाली प्लॉट में गड्ढा खोद कर उसे दफ़न कर दिया.

पर हमें यह पता नहीं था की मामला अभी दफ़न नहीं, शुरू हो रहा है. वो लड़का, जो गाड़ी चला रहा था, किसी वरिष्ट पुलिस अफ़सर का भांजा या भतीजा था. दूसरी सुबह पुलिस की एक गाड़ी बीबी के घर के सामने आ कर खड़ी हो गयी, और हमने जब रुक कर जाँचना चाहा की माजरा क्या है, तो एक कांस्टेबल ने डंडा घुमा कर आगे बढ़ने को कहा. मैंने बाद में सुना कि वो बीबी को स्टेशन तक ले गए, इस आरोप पर की उन्होंने उस लड़के पर जानलेवा हमला किया था. पर वो लड़का गबरू जवान और बीबी एक अधेड़ उमर की नाटी औरत. यहाँ तक कि अगर इस झड़प के कोई चोट के निशान थे तो वो बीबी पर - क्यूँकि जब वो लड़का गाड़ी निकालने की कोशिश कर रहा था, तो उससे एक बार धक्का खा कर बीबी पीछे गिर गयीं थी और उसकी रगड़ उनकी पूरी बाँह और कंधे पर थी. पर बीबी को उन्होंने वहाँ रात तक रोके रखा. कॉलोनी के एक-दो अंकल भी साथ थे उनका पक्ष देने, और रात को जब बीबी उनके साथ वापिस लौटीं, तो ऐसी बेजान और पस्त-हालत में लग रहीं थी की मैंने सोचा कल जा कर ख़ैर ले लूँगा. गाड़ी से जब वो उतरीं तो कुत्तों का वो झुंड उनके पास ऐसे दुम-हिलाते आया जैसे उन्हें आभास था की उनके प्रति सहानभूति रखने की वजह से ही बीबी पर कोई विपदा आई है.

ज़ाहिर, है, उस दिन किचन बंद रहा.

दूसरे दिन उनके दरवाज़े पर एक नयी मुसीबत खड़ी हो गयी. नगर-पालिका के दो अफ़सर जो उस इलाके में उनके किचन चलाने का पर्मिट देखना चाहते थे. हालांकी, उनके बग़ल में ही एक परचून की दुकान चल रही थी, और हमारा ख़ुद का, बारह लड़कों का पीजी सामने खड़ा था. पर सरकारी अफ़सर उसूल का पक्का, वो यह फ़ालतू की दलीलें क्यूँ सुनेगा. यहाँ तक वो हमारे मकान मालिक तक पहुँच गए, शायद उनका इस ग़ैरक़ानूनी किचन पर बयान लेने. मैं ऑफ़िस के लिए निकल रहा था, पर गेट पर उनको बात करते देखा. मुझे बोली तो समझ नहीं आई पर बी.एन.आई. की आँखों में चमक देख कर समझ आ रहा था कि वो अपने रोज़ के दो सौ चालीस के नुक़सान का खुल के कसर निकाल रहा है.

शाम को जब हम लौटे तो किचन फिर से बंद, बल्कि उसके दरवाज़े पर नगरपालिका की सील. हम बीबी से मिलने ऊपर गए पर उनका भी कमरा बंद - पता चला वो कहीं किसी अफ़सर से दरख्वास्त करने गयीं थी. बग़ल में एक सज्जन अंकल थे, उन्होंने यह सब बताया. वो अपने गेट पर खड़े, ऐसे उत्सुक भाव से बता रहे थे जैसे यह सब कोई फ़िल्म की कहानी हो. हमारी तरह उन्हें भी यक़ीन नहीं आ रहा था की सिर्फ़ तीन दिन में इतना बहुत कैसे हो गया. फिर उन्होंने कुछ बताया जिससे मेरी तो कंपकंपी छूट गयी. कि किसी खुन्नस-खाए पड़ोसी ने उन अफ़सरों से यह तक बोल दिया था कि बीबी शायद ऊपर का कमरा भी देती हैं ऐसे-वैसे कामों के लिए. कि उसने ख़ुद एक लड़का-लड़की को कितनी बार ऊपर जाते देखा है. मेरे दोस्तों को तो समझ नहीं आया पर मैं तुरंत भांप गया की बढ़ा-चढ़ा कर यह ज़िक्र मेरा और मेरी गर्लफ्रेंड का हो रहा है.

मेरी तो सिट्टी-पिट्टी गुम. ख़ुद से ज़्यादा फ़िकर उस लड़की की थी, जो की बहुत ही रूढिवादी परिवार से थी. अगर बात पुलिस तक पहुँच गयी और उनको ख़बर हो गयी की उनकी लड़की का रोमांस चल रहा है, मैं सच बोल रहा हूँ, उसकी झट नौकरी छुड़वा कर वो कहीं बिरादरी में शादी करा देते. और मुझे यक़ीन था की यह अफ़वाह फैलाने वाला और कोई नहीं, हमारे बी.एन.आई. थे.

मैं उसी क्षण से बिलकुल गायब हो गया. शहर के दूसरे कोने में कुछ कॉलेज के दोस्त एक फ्लैट किराए पर ले कर रह रहे थे. उनके यहाँ एक-दो हफ़्ते के लिए चला गया. वापिस आया तो मामला लगता था थोड़ा बहुत ठंडा हो चुका है, हालांकी किचन अभी भी बंद था. एक बार बीबी भी दिखीं, ऑटो में कहीं से आ रहीं थी और गेट पर उतर के, किराया दे कर, अंदर चली गयीं. पर मैं मिलने नहीं गया, क्यूँकि अभी भी काफ़ी डरा हुआ था. मैं जब भी बी.एन.आई. को देखता तो यह फ़िकर में घिर जाता की यह पता नहीं कब मेरे और उस लड़की के बारे में वो झूठा मुद्दा फिर छेड़ दे. झूठा हो या सच्चा, उसकी लौ में तो हम ही तपने वाले थे ना, ख़ासतौर पर वो बेचारी लड़की. मुझे लग रहा था कि अभी इतनी जल्दी चला जाऊँगा बीबी के पास तो यह देख लेगा और फिर कुछ ठिकाना नहीं इसके कमीने के दिमाग़ का.

दो हफ़्तों में ही उसने नीचे एक सीले कमरे में अपना किचन फिर शुरू कर दिया था. पच्चीस रुपए थाली, और हॉस्टल से बदतर खाना. पर मैं जितना बन पाता, वहीं खाता था, उसे ख़ुश रखने को. बाक़ी लड़कों ने पास में एक ढाबा ढूँढ लिया था. वो बीबी के घर कभी-कभार जाते थे और एक बार यह भी बताया कि वो मेरे बारे में पूछ रहीं थी. पर संयोंग से मैं फिर से एक प्रोजेक्ट में दिन-रात लग गया था, इसलिए ना जाने का बहाना था. और, क़िस्मत का खेल, इसी प्रोजेक्ट के सिलसिले एक ही महीने में मेरा ऑनसाईट भी गया. न्यू जर्सी.

मैं वहाँ तीन महीने रहा, फिर जब एक्सटेंशन हो गया, तो दो हफ़्ते के लिए वापिस आया, जिसमें दो दिन बैंगलोर का चक्कर लगाया - वो पीजी छोड़ने और अपना टाँड-भर का सामान एक दोस्त के यहाँ स्थानांतरित करने. इस हड़बड़ी में मुझे सच में एक बार भी बीबी का ख़याल नहीं आया. चेन्नई पहुँचा वापिस फ्लाइट पकड़ने तो एअरपोर्ट पर खड़े याद आया - और अपनी इस बेपरवाही पर शर्म भी आयी. ख़ुद को कहा कि अगली बार आऊँगा तो ज़रूर जाऊँगा बीबी से मिलने.

पर एक्सटेंशन होते-होते सालों बीत गए. मेरा ग्रीन कार्ड आ गया. और फिर सिटीजनशिप. शादी हो गयी, दो बेटियाँ हों गयीं, और काम और गृहस्थी के इस चक्रव्यूह में बीबी को मैं पूरी तरह भूल गया.

आज बहुत सालों बाद उस पीजी के किसी दोस्त से मुलाक़ात हुई. वो भी एक नहीं, दो-दो एक साथ. सात समुंदर पार इस पब में जब यह महफ़िल बैठी, तो बीबी का भी ज़िक्र हुआ. उनका नाम सुन कर जैसे दिमाग़ में कोई बहुत सालों से बंद, मकड़ी के जालों से भरी एक कोठरी अचानक खुल गयी.

हाँ-आँ! बीबी! वो अभी भी हैं वहाँ पर? अरे, और उस कांड का फिर क्या नतीजा निकला? उनका किचन दुबारा खुला?

किचन हमेशा के लिए बंद ही रहा. पर बग़ल की सड़क में एक ही साल में इतने रेस्तरां, उड़पी और वैष्णव ढाबे खुल गए थे, कि यह बखेड़ा ना भी होता, तो भी शायद वो छोटा सा किचन बहुत दिन नहीं टिक पाता.

बीबी ने पास के एक मोंटेसरी में काम शुरू कर दिया था. साथ ही साथ कहानी-वाचन भी शुरू कर दिया था. टेबल पर एक साथी उन दिनों के एक और दोस्त से सम्पर्क में था, जो उसे बता रहा था कि वो एक बार अपने बच्चे को ले गया था बीबी के एक स्टोरीटेलिंग बैठक में. बता रहा था कि बीबी उसे देख कर बहुत ख़ुश हुईं थी और सबके बारे में पूछ रही थीं.

इस बात के बाद थोड़ी देर टेबल पर चुप्पी रही. हम सब अपनी सोच में डूबे थे. कि वक़्त कितनी जल्दी गुज़रता है. अभी पल भर के लिए बीबी हमारे बीच ऐसे तरो-ताज़ा बैठीं थी जैसे हम कल रात को ही उनसे मिले हों. पर यथार्थ में उन दिनों का कुछ भी नहीं रहा. ना वो किचन, ना वो पीजी, ना वो बैंगलोर, ना हम. बीबी भी दो-तीन साल पहले गुज़र चुकी थीं.

मैं यह सोच रहा था कि उनसे आख़री बार ठीक से मैं तब ही मिला था जिस दिन मैं उस लड़की को उनके यहाँ ले गया था. पर इसका मुझे कोई शोक या पछतावा नहीं हो रहा था - कुछ नहीं लग रहा था. वक़्त इतना गुज़र चुका था कि अब वो दिन किसी और की जीवनी के क़िस्से लगने लगे थे. मुझे तो अब उस लड़की का भी कुछ अता-पता नहीं था, कि कहाँ है, कैसी है. मेरे यहाँ आने के बाद हमारा रिश्ता भी टूट गया था.

एक दोस्त भारी साँस छोड़ते हुए अपनी सीट पर पीछे हुआ. मैंने उसकी तरफ़ आँख उठाई तो हमारी आँखें मिली और थोड़ी देर के लिए एक दूसरे पर ठहरी रहीं. फिर दूसरे दोस्त ने बोला कि एक और पिचर मँगाते हैं, और हम किसी और चीज़ के बारे में बात करने लगे.

पर मैं अंदर ही सोच रहा था कि जब यादें धुँधली पड़ जाती हैं, तो एक मूड बन कर रह जाती हैं अंदर. जैसे एक पुराना गाना जिसकी धुन पर कभी हम पैर थिरकाते थे रात को अकेले अपने कमरे में. वैसे ही बीबी की याद से बैंगलोर के वो शुरुआती दिन एक मूड की तरह मुझमें फिर से थिरक रहे थे - वो सुहाना मौसम, हर तरफ़ पेड़ों की छाँह, शाम की ठंडी हवाएँ, बीबी की चुपड़ी रोटियाँ, उनके ड्राइंग-रूम में वो चर्चे, वो पहला कोमल प्यार. बीबी ना होती तो शायद उन दिनों की अलग यादें होती, बी.एन.आई. की कड़वाहट में घुली - वो तंग कमरे, वो रोज़ का ओछापन, वो ब्लडी नार्थ-इंडियन्स!

मैंने चुपचाप सर झुका के एक मिनट को आँखें मूँदी, और बीबी का ध्यान लगा कर उन्हें शुक्रिया अदा किया.

***

अंशुमन आचार्य बैंगलोर निवासी लेखक हैं, जो ज्यादातर अंग्रेजी साहित्यिक-शैली और पटकथा लेखन में काम करते हैं। इनके नाटक "बुली" को धौली प्रेस ने प्रकाशित किया है, और इनका पहला उपन्यास फिलहाल प्रकाशनाधीन है।

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