दक्खन के कवि: बेंगलुरु पर केन्द्रित सात कविताएँ

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दक्खन के कवि: बेंगलुरु पर केन्द्रित सात कविताएँ

संचयन : अंजुमन लिटरेरी क्लब

साल 2011 में स्थापित अंजुमन कवियों और कविता प्रेमियों का एक समुदाय है, जो नैसर्गिक ढंग से बेंगलुरु में पनपा और समृद्ध हुआ है। प्रस्तुत है अंजुमन से जुड़े साथियों द्वारा लिखी गई शहर के जीवनानुभवों पर कविताएँ।

इस शहर का कोई जिस्म होता

- अतुल जैन

इस शहर का कोई जिस्म होता
तो इसकी नसों में गाड़ियाँ बहती
और धीमी गाडियों का ये शहर
इसके बाशिंदों से उलट
लो ब्लड प्रेशर का मरीज़ होता
जो हर शुक्रवार
बन जाता है एक दूल्हा
जिसके साफे पर
टिमटिमाती है झालर
जिसने पहनी हुई है नोटों की माला
और एक बदहवास दोस्त इसका
नाचता रहता है पूरी रात

हवाई जहाजों से लौटते लोग
लाते है छूटे हुए शहरों का स्वाद
पर कोई नहीं जानता कि
पुरानी गलियों में बसा यह शहर
कैसी गंध देता होगा,
देखो पट्टेधारी लोग, तो लगता है कि
पूरा शहर चारागाह हो गया है
जिसमें आदमी जानवर लगता है
जिन पर दागे जाते थे निशान
और जली चमड़ी पर सूरज देख
बता सकते थे मालिक का नाम

इस शहर ने तय किया
कि हर एक को मयस्सर हो
छाँव डाल या कोटर
पर इसके बाशिंदों ने तय किया
कि वो लगातार
खोदते रहें इसे, और अब
इक खान सा लगता है ये शहर
जिसे जरुरत से ज्यादा खोदा गया है
और खिंच ली गई है इसकी खाल

किसी रोज़ यह शहर मर जायेगा
पर बाशिंदे तब भी करते रहेंगे
इस मरी औरत का स्तनपान
जब तक कि
दूध की जगह खून न निकलने लगे
मुमकिन है कि कई रोज़ तक
वो खून भी पीते रहे
और खोद डाले ये शहर
ये जानकर भी कि
यह शज़र गिर जायेगा
और ठूंठ पर नहीं बसेगा
कोई बसेरा

या जिस रोज़ ये शहर मर जायेगा
तुम बदल दोगे अपना ठिकाना
और यह शहर
मोहनजोदड़ो की कहानियों में कहा जायेगा।

***

बारिश में बाजार

- अभिनव यादव

सावन का शहर में आना
बारिश में बाजार

मिट्टी फेंकती है
कत्थेदार चूने की महक
आती उसे महक कर
खाने के बाद पान चबाने वाली
सुस्ती

धूल छटते ही
गोबर उभरता है सड़क पर
पहिया केक काट कर बनाता है बर्थडे
जाता है दूर तक लम्बी उम्र के

कोनों में पड़ी पन्नियाँ उफनती हुई उड़ाती है
कुत्ता दुबक के जाता छिप ठेलो के नीचे
ठेले वाला, ऐंठता है पैर के अंगूठे से बोरी
रखता ढक जिससे वो नोट
बिछा देता है पन्नी
ओढ़ लेता है पन्नी

गिरते ही पानी
सड़क का ऐसा रंग बदल लेना
चालीस की उम्र में
इतवार को बाल रंगा, सोमवार को निकला हो

पन्नी पर पानी की पट पट सुन
वो सुलगता है बीड़ी
कुत्ता कूंकता हैं
वो ठठरी दिखने लगता है बाजार की

लम्बी साँस भर कर
छींक गया है ये बाजार

भीड़ भाग गयी है

बारिश में बाजार
शहर का अकेलापन
भंगुर।

***

बरसात नहीं होती

- विनीत सोलंकी

ना कैब मिल रही है ना बाइक से जा पा रहा हूँ
घर पहुँचना इतना मुश्किल ना होता अगर बरसात नही होती
बैंगलोर के बादलों से बस यही शिकायत है
दफ़्तर जाते समय क्यों बरसात नही होती

ज़रूरतों के जाल में फँसतें परिंदे क्या करें
ख्वाहिशों के क़तल की तो तहकीकात नही होती
अक्सर भीगना पड़ता है ट्रैफ़िक में फिर भी लोग कहते हैं
अब इस शहर में पहले जैसी बरसात नही होती

वैसे इस शहर में बसना चाहता था मैं
उनसे आशिकी में गर मेरी मात नही होती
इस शहर में वो दिन भी देखे हैं हमने
जब बादल तो आ जाते हैं बरसात नही होती

एक दिन वो रूठा था मुझसे मैं मनाने नही गया
वरना वो मेरी क़ैद से कभी आज़ाद नही होती
उस रात बहुत पी मैंने फिर बाइक से घर गया
रस्ते में पुलिस पकड़ लेती अगर बरसात नही होती

वैसे इस शहर में मौसम सुहाना है
हर शहर में क़ुदरत की ये सौगात नही होती
यहाँ बेवक़्त बारिशें वरना ऐसे शहर भी हैं
कहीं बाढ़ आ जाती है कहीं बरसात नही होती

जाने क्या खौफ़ है जो दोनों दिलों में है
मिलकर भी अब उनसे मुलाक़ात नही होती
नज़रें मिलीं तो मुस्कुरा देते हैं हम दोनों
ग़नीमत है कि आँखों से बरसात नही होती

***

चट मँगनी पट ब्याह

- ममता शर्मा

बारह दिवस मात्र बारह दिवस 

और मैं मेरठ से बैंगलोर वाली हो गई 
विवाह क्या हुआ मैं पीहर से बेगानी हो गई 
थोड़ी रुकी सी मेरी ज़िंदगीमें कुछ रवानी सी हो गई 
क़िस्से कहानियों सी ज़िंदगी नूरानी हो गई !

क्या पानी और हवा इतना बदल देते हैं 
क्या किसी शहर के मोड़ नई शक्ल देते हैं
क्या नए मकाँ कुछ नई अक्ल देते हैं 
क्या कुछ शहर आपकी ही नई नक़ल देते हैं ?

मै यहाँ आ खो गई सादगी व अपने पन में 
मीठे लोगों की सहजता व अनोखे ढंग में 
रोशनी मिली मुझे इस नव से शहर-वन में 
ताज़गी मिली मुझे यहाँ के हर उपवन में।

तरकारी जो चाहीं सारे साल मिलीं
हिंदी बोलने वालों की खूब भरमार मिली 
धन-मान नौकरी सभी ख़ुशियाँ मिलीं 
सोई तन में चुपचाप मुझे कविता भी मिली।

कुछ नए खानों से जान-पहचान हुई है 
कई नए त्योहारों ने मेरी नब्ज छुई है 
एम.टी आर, हल्लिमने, फ़ूड कोर्ट,विद्यार्थी हैं 
खाने के बाद वाली कॉफ़ी दूध की मलाई है 


पर 
रौनक़ों का अब नया अवतार जन्म ले रहा है 
मॉल संस्कृति का आकार शक्ल ले रहा है 
कंकरीट का दैत्य पाँव पसार रहा है 
विकास नए नाम ले-ले कर पेड़ काट रहा है।

जब आई थी हरियाली हर तरफ़ ही थी 
साँस ताज़ी हवा नम व ख़ालिस सादगी ही थी 
लोग-बाग देख के हँसते-मुस्कुराते थे 
मुझे बाहर का जान कर भी प्रेम से बतियाते थे ।

आज हर कोई बस फ़ोन लिए चलता है 
सूर्य ना जाने कब निकलता और ढलता है 
सड़क बस भागती भरी-भरी सी उफनती हैं 
रह-रह के एक बेचैनी सी पसरती है ! 

फिर भी अभी भी लोग शांत व शिष्ट हैं  
बदल रहे हैं मगर फिर भी विशिष्ट हैं 
अच्छे मूल्य पुराने वसियों में अवशिष्ट हैं
कन्नड़ के कई शब्द अभी भी मेरे लिए क्लिष्ट हैं ।

***

शून्यालाप

- अंकुर पाण्डेय

संडे रात चार बजे
मैं छज्जे से रोड को
और पाइथन के कोड को
देख कर सोच रहा कैसे डिबग करूँ?
तारकोल उड़ेल कर, रूबी को रेल पर
लैपटॉप गोदी और हिंदुस्तान मोदी पर
डाल कर मैं हो गया हूँ पात-पात,
गात माहिं बात करामात,
इंस्टाग्राम व्हाट्सैप
यूपी में गैंगरेप
अर्थशास्त्र-राजनीति-तकनीक-संगीत-कला
शब्दों का सिलसिला
पीला-पीला, पिलपिला
कहीं कहीं लाल भी
रंगों में घिसट-घिसट
बीत गए मिनट-मिनट
घंटे-दिन, दिन-महीने,
साल भी
बालों की खाल भी

सत्य का आह्वान करो-

तो सत्य की सौतेली बहन उत्तर-आधुनिकता
जिसके कमाटीपुर में धुंआधार बिकती है
औने-पौने दाम में
छद्म-बौद्धिकता और इंस्टेंट कामुकता,
मैं बोर हो जाता हूँ पर अघा नहीं पाता

गला भर्राता नहीं
जिया घबराता है

के पन्ना अभी खाली है,
क़सम है मुझे इस उत्तर-आधुनिकता की
विज्ञान की और धर्म की
उस तथाकथित मर्म की
सीरिया की, ईराक़ की
ओबामा, अमर्त्य की
कटे-फटे, लुटे-पिटे, गिरे-पड़े सत्य की
और क़सम उस ख़ुदा की-
के पन्ना ये भरना है,
शब्दों का झरना है
या नाला या सीवर भी
समय का साइफन जाम ठीक कर देगा
मेरा जाम भर देगा
वरना क़सम खाकर शब्दों के झरने की
जाम और चखने की
और क़सम उस ख़ुदा की-
रामकथा बांचन को जामवंत स्वर देगा।

***

खाली खोखली आँखें

- सुरभि घोष

वो भिखारिन यूँ ही मेरी रंगीन नज़रों के सामने आ गयी थी.
मैले कुचले कपड़े और हाथ में बिलबिलाता बच्चा

मैंने उसकी आंखों में झाँका कि कहीं कोई दर्द दिखे
और इसी बहाने मुझे भी अपनी ज़िन्दगी थोड़ी बेहतर लगे

लेकिन वे आँखें खाली खोखली
अँधेरी सुरंग थीं
उस पार क्या था
कोई खबर नहीं.

बंद पोटली से लटकते
बिलबिलाते उसके बच्चे का
चेहरा था ही नहीं
न नाक थी, न मुँह
सिर्फ दो आँखें थीं, खाली खोखली

कुछ सूखे आंसुओं के निशान थे
उसके बंजर चहरे पर जाने कहाँ से आये थे!

फिर मैंने अपना मन टटोला वो भी बिलकुल खाली खोखला
तसल्ली दी खुदको कि इन्हें मेरी दया की ज़रुरत नहीं

मगर वो आँखें
वो खाली खोखली आँखें
बहुत देर तक मेरे साथ चलती रहीं।

***

परवा लेदु

- सौरभ राय

बाबा ने पूरा जीवन रेलवे माहौल में बिताया
तब दक्षिण-पूर्व रेल का प्रसार बिहार से आंध्र तक था
तो छोटे से कसबे भोजुडीह में रहकर भी
कॉलोनी के यार-दोस्तों से मसखरी करते
थोड़ी-बहुत तेलगु सीख गए थे बाबा
बाद तक टूटी-फूटी तेलगु बोलकर वे झटपट कर लेते थे दोस्ती
राँची या लोहरदग्गा के किसी बैंक या गैस वाले के साथ
बाबा बोलते मैं विशाखापट्टनम को गंध से पहचानता हूँ
और जब भी घूमने निकलते चाहे जा रहे हों दिल्ली
बर्थ के नीचे बैग ठाँसते हुए बोलते
परवा लेदु

रिटायरमेंट के बाद
जब बेंगलूर आकर मेरे पास रहने लगे
कंडक्टर छुट्टा नहीं लौटा पाता बाबा बोलते परवा लेदु
सड़क किनारे रुमाल बेचने वाले को टालते हुए कहते परवा लेदु
घर आए बढ़ई को हथौड़ा पकड़ाते कहते परवा लेदु
मैं सोचता बाबा क्यों बोलते हैं कन्नड़ राज्य में तेलगु
जहाँ हिंदी से चल जाता है मेरा काम
और थोड़ा बहुत अंग्रेज़ी और इशारे से
मसलन दुकानदार से मैं पूछता हूँ हाउ मच
और फ़ोन से कर देता हूँ पेमेंट

बांग्ला माध्यम में पढ़े बाबा
अच्छी हिंदी बोलते हैं
और टूटी-फूटी अंग्रेज़ी उड़िया और तेलगु
इस उमर में वे कन्नड़ा सीख जाएंगे मुझे शक है
ऐसे में वो क्या बात है जिसकी उन्हें परवाह नहीं
जिसे वे दुहराते रहते हैं बार-बार तेलगु में
कोई नहीं जानता।

***

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